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सेज पर बिछने को होते फूल जैसे पर - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२



हम जरूरत के लिए विश्वास जैसे हैं

नाम पर सेवा के लेकिन दास जैसे हैं।१।

**

सेज पर बिछने को होते फूल जैसे पर

वैसे पथ के  पास  उगते  घास जैसे हैं।२।

**

है हमारा मान केवल जेठ जैसा बस

कब  तुम्हारे  वास्ते  मधुमास जैसे हैं।३।

**

दूध लस्सी  धी  दही  कब  रहे तुमको

कोक पेप्सी से बुझे उस प्यास जैसे हैं।४।

**

रोज हमको हो निचोड़ा आपने लेकिन

स्वेद भीगे हर  किसी …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 14, 2020 at 10:01am — 1 Comment

प्यार से भरपूर हो जाना- ग़ज़ल

 मापनी १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ 

बहुत आसान है धन के नशे में चूर हो जाना, 

बड़ा मुश्किल है दिल का प्यार से भरपूर हो जाना.  

 

अगर वो चाहता कुछ और होना तो न था मुश्किल,

मगर मजनूँ को भाया इश्क में मशहूर हो जाना. 

 

भले दो गज जमीं थी गॉंव में अपने मगर खुश…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 13, 2020 at 5:59pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं(ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212

ज़िन्दगी गर मुझको तेरी आरज़ू होती नहीं

अपनी सांसों से मेरी फिर गुफ़्तगू होती नहीं

गर तड़प होती न मेरे दिल में तुझको पाने की

मेरी आँखों में, मेरे ख्वाबों में तू होती नहीं

उम्र गुज़री है यहाँ तक के सफ़र में, दोस्तो!

पर ये वो मंज़िल है, जिसकी जुस्तजू होती नहीं

ये जहाँ गिनता है बस कुर्बानियों की दास्ताँ

जाँ लुटाये बिन मुहब्बत सुर्ख-रू होती नहीं

दोस्तों के दिल मुनव्वर जो नहीं होते 'शकूर'

रौशनी भी…

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Added by शिज्जु "शकूर" on July 13, 2020 at 1:09pm — 6 Comments

रानी अच्छन कुमारी

       भारतवर्ष के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान को अपने समय का सबसे बड़ा योद्धा माना जाता है| जिसकी वीरता के किस्से उस समय पूरे भारत में गूंज रहे थे| पृथ्वीराज चौहान अजमेर राज्य का स्वामी बना तो उसके चाचा पृथ्वीराज को चौहान राज्य का वास्तविक अधिकारी नहीं मानते थे। इसी कारण पृथ्वीराज के चाचा अपरगांग्य ने पृथ्वीराज के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तो पृथ्वीराज ने अपने चाचा को परास्त कर उसकी हत्या कर दी। इस पर पृथ्वीराज के दूसरे चाचा व अपरगांग्य के छोटे भाई नागार्जुन ने…

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Added by PHOOL SINGH on July 13, 2020 at 12:09pm — 4 Comments

काश कहीं से मिल जाती इक जादू की हाथ घड़ी (ग़ज़ल)

काश कहीं से मिल जाती इक जादू की हाथ घड़ी

मैं दस साल घटा लेता तू होती दस साल बड़ी

माथे से होंठों तक का सफर न मैं तय कर पाया

रस्ता ऊबड़-खाबड़ था ऊपर से थी नाक बड़ी

प्यार मुहब्बत की बातें सारी भूल चुका था मैं

किस मनहूस घड़ी में…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 12, 2020 at 11:29pm — No Comments

ग़ज़ल- रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

रोज़ सितम वो ढाते देखो हम बेबस बेचारों पर

कोई अंकुश नहीं लगाता इन सरमाया दारों पर।

मजदूरों का जीवन देखो कितना मुश्किल होता है

बिस्तर पास नहीं जब होता सो जाते अख़बारों पर।

भूक ग़रीबी ज्यों की त्यों क्यों तख़्त नशीं कुछ तो बोलो

दोष मढ़ोगे कब तक आख़िर पिछली ही सरकारों पर।

वक़्त नहीं है पास किसी के सबको अपनी आज पड़ी

दौर पुराना ख़्वाब लगे जब भीड़ जुटे चौबारों पर।

बच्चे झुककर बात करेंगे घर के सारे लोगों से

आईने जब लग जाएँगे घर…

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Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 12, 2020 at 12:59pm — 8 Comments

दो लघु-कवितायें — डॉo विजय शंकर

सच्चे मन से ईश्वर

मंदिर से अधिक

अस्पतालों में

याद किया जाता है l 

जो…

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Added by Dr. Vijai Shanker on July 12, 2020 at 8:30am — 2 Comments

रोटी.....( अतुकांत कविता)

रोटी का जुगाड़

कोरोना काल में

आषाढ़ मास में

कदचित बहुत कठिन रहा

आसान जेठ में भी नहीं था.

पर, प्रयास में नए- नए मुल्ला

अजान उत्साह से पढ रहे थे...

दारु मृत संजीवनी सुरा बन गयी थी

सरकार के लिए भी,

कोरोना पैशैन्ट्स के लिए भी

और, पीने वालों का जोश तो देखने लायक था,

सबकी चाँदी थी...!

आषाढ़ तो बर्बादी रही..

इधर मानसून की बारिश

उधर मज़दूरो की भुखमरी

और, बेरोज़गारी.....

सच, मानो कलेजा मुुँह

को आ गय़ा...!…

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Added by Chetan Prakash on July 11, 2020 at 1:00pm — No Comments

ग़ज़ल -पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको

था सब आँखों में मर्यादा का पानी याद है हमको

पुराने गाँव की अब भी कहानी याद है हमको।

भले खपरैल छप्पर बाँस का घर था हमारा पर

वहीं पर थी सुखों की राजधानी याद है हमको

वो भूके रहके ख़ुद महमान को खाना खिलाते थे

ग़रीबों के घरों की मेज़बानी याद है हमको

हमारे गाँव की बैठक में क़िस्सा गो सुनाता था

वही हामिद के चिमटे की कहानी याद है हमको

सलोना और मनभावन शरारत से भरा बचपन

अभी तक मस्त अल्हड़ ज़िंदगानी याद है…

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Added by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on July 11, 2020 at 12:00pm — 14 Comments

रोटी

जीवित रहने के लिए जीव,

रहता है जिस पर निर्भर।

आटे से बनती है जो और

गोल गोल जिसकी सूरत।।

सही पहचाने नाम है उसका,

कहते हैं सब रोटी।

मम्मी के हाथों की रोटी,

बड़े स्वाद की होती।।

भूखे को मिल जाए जो रोटी,

तो त्रप्ति उसको होती।

आत्मनिर्भर बनने के लिए,

कमानी पड़ती है रोजी रोटी।।

भूल ना जाना तुम ये बात,

जब भी पकाओ तुम रोटी।

सबसे पहले गाय की रोटी,

और अंत में कुत्ते की रोटी।।

मानव की मूल…

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Added by Neeta Tayal on July 11, 2020 at 11:58am — 2 Comments

ग़ज़ल ( उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो....)

(221 2121 1221 212)

उकता गया हूँ इनसे मेरे यार कम करो

ख़ालिस की है तलब ये अदाकार कम करो

आगे जो सबसे है वो ये आदेश दे रहा

आराम से चलो सभी रफ़्तार कम करो

वो हमसे कह रहे हैं कि मसनद बड़ी बने

हम उनसे कह रहे हैं कि आकार कम करो

जो मेरे दुश्मनों को गले से लगा रहा

मुझसे कहा कि दोस्तोंं से प्यार कम करो

अपने घरों में क़ैद हैं , हर रोज़ छुट्टियाँ

किससे कहें कि अब तो ये इतवार कम करो

बाज़ार में तो…

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Added by सालिक गणवीर on July 11, 2020 at 7:30am — 8 Comments

रोटी

जीवित रहने के लिए जीव,

रहता है जिस पर निर्भर।

आटे से बनती है जो और

गोल गोल जिसकी सूरत।।

सही पहचाने नाम है उसका,

कहते हैं सब रोटी।

मम्मी के हाथों की रोटी,

बड़े स्वाद की होती।।

भूखे को मिल जाए जो रोटी,

तो त्रप्ति उसको होती।

आत्मनिर्भर बनने के लिए,

कमानी पड़ती है रोजी रोटी।।

भूल ना जाना तुम ये बात,

जब भी पकाओ तुम रोटी।

सबसे पहले गाय की रोटी,

और अंत में कुत्ते की रोटी।।

मानव की मूल…

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Added by Neeta Tayal on July 11, 2020 at 6:54am — No Comments

रोटी

जीवित रहने के लिए जीव,

रहता है जिस पर निर्भर।

आटे से बनती है जो और

गोल गोल जिसकी सूरत।।

सही पहचाने नाम है उसका,

कहते हैं सब रोटी।

मम्मी के हाथों की रोटी,

बड़े स्वाद की होती।।

भूखे को मिल जाए जो रोटी,

तो त्रप्ति उसको होती।

आत्मनिर्भर बनने के लिए,

कमानी पड़ती है रोजी रोटी।।

भूल ना जाना तुम ये बात,

जब भी पकाओ तुम रोटी।

सबसे पहले गाय की रोटी,

और अंत में कुत्ते की रोटी।।

मानव की मूल…

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Added by Neeta Tayal on July 11, 2020 at 6:36am — 2 Comments

वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया (ग़ज़ल)

बह्र-221/2121/1221/212

वो मेरी ज़िंदगी को सदा छोड़ क्या गया

आँखों से प्यार का मेरे मौसम चला गया[1]

वो किस जतन से रो रहा है अब अज़ाब में

इक रोज़ रात को मेरे ख़्वाबों में आ गया[2]

उसके नज़र के पास मैं, रहता था और वो

हद्द-ए नज़र से मुझको हटाता चला गया[3]

उसको ख़बर थी मौत मेरी तीरगी से है

जलते हुए चराग़ तभी तो बुझा गया[4]

लगता है उसकी आंख में थोड़ा मलाल है

जब जा रहा था दूर मुझे देखता गया[5]

रूपम…

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Added by Rupam kumar -'मीत' on July 10, 2020 at 10:00am — 7 Comments

तेरे ख्वाहिशों के शह्र में- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'(गजल)

२२१/२१२१/१२२१/२१२१/२



लिखना न मेरा नाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में

आयेगा कुछ न काम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।१।

**

सबको पता है धूल से बढ़कर न मैं रहा कभी

ऊँचा भले ही दाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।२।

**

सूरज न उगता भोर का तारों भरी न रात हूँ

ढलती हुई सी शाम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।३।

**

रावण बना दिया है मुझे प्यास ने हवस की यूँ

करना न मुझको राम तेरे ख्वाहिशों के शह्र में।४।

**

चाहत न कोई नाम की रिश्ता अगर बना कोई

चलना मुझे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 10, 2020 at 6:45am — 10 Comments

गीत- नेह बदरिया नीर नदी बन

नेह बदरिया नीर नदी बन

आंखों आंखों स्वप्न सधे हैं

काजल की काली रेखाएं

सरिता पर ज्यूँ बांध बांधें हैं।

नख बन भाव कुरेदें बातें

यादें मोहक धूमिल छवि की

टूट रहे पतवार हृदय के

तूफानी लय है सांसों की

पर्वत से तटबंध दिलों पर

सकुचाते उदगार बंधें हैं।

काजल की काली रेखाएं

सरिता पर ज्यूँ बांध बांधें हैं।

मुनरी कंगन छागल बिछुए

सबकी सबसे रार हुई है

गजरे की अनबन बालों से

अबकी पहली बार हुई है

आतुर है श्रृंगार…

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Added by Neelam Dixit on July 9, 2020 at 11:26pm — 2 Comments

छत पे आने की कहो- ग़ज़ल

मापनी २१२२ २१२२ २१२२ २१२ 

इस जिग़र में प्यास बाकी है बुझाने की कहो, 

झूमती काली घटा से छत पे आने की कहो. 

है मधुर आवाज़ उसकी और चेहरा खूबसूरत,

गीत सावन के सुहाने आज गाने की कहो. 

देखना गर चाहते हो इस जहाँ को ख़ुशनुमा, …

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Added by बसंत कुमार शर्मा on July 9, 2020 at 8:44pm — 8 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 2122

अपनी  रानाई  पे  तू  मग़रूर  है  क्या ।

बेवफ़ाई  के  लिए  मज़बूर  है  क्या ।।

कम न हो पाये अभी तक फ़ासले भी ।।

तू  बता  उल्फ़त  की  दिल्ली  दूर  है क्या ।।

दूर तक चर्चा है क़ातिल के हुनर की ।

वो ज़रा  सी उम्र में मशहूर  है  क्या ।।

तोड़ देना दिल किसी का बेसबब ही ।

शह्र   का   तेरे  नया  दस्तूर  है  क्या ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on July 9, 2020 at 3:00pm — 3 Comments

उरिझै कवनेउ मंद

सत्य सुनावै मनई कोउ

भरि साँसैं जमुहाईं

झूठि जहाँ पर चलि रहा

हुइ चैतन मुसुकाहिं

बहुतै मजा मिलै जहाँ

चुगली खावैं लोग

नमक, खटाई, मिरचि जब

चटकि , तबहिं मन मोद

का कलजुग ना दिखावै

सत्पथ धरहि जो पाँव

तपति मरूथल रेत जसि

दीखै कहूँ न छाँव

मौनी अब तौ साधिहौं

वाहै मा आनन्द

ई सांसारिक जालि मा

उरझै कवनेउ मंद

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on July 8, 2020 at 6:28pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी

रात दिन तुमको पुकारा,

किन्तु तुम अब तक न आए !

चित्र मेरी कल्पना के,

मूर्तियों में ढल न पाए !

 

चिर प्रतीक्षित आस के संग, प्यार अपना बाँट लूँगी ।

उम्र आधी कट गई है, उम्र आधी काट लूँगी !!

 

प्रेम तुमसे ही तुम्हारा,

किस तरह आखिर छिपाऊँ ?

और कह भी दूँ, कहो यह,

रीत फिर कैसे निभाऊं ?

 

गूँजते हो धड़कनों की,

थाप पर अनुनाद बन कर !

मौन मन की सिहरनों में,

घुल चुके आह्लाद बन कर…

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Added by Dr.Prachi Singh on July 8, 2020 at 4:30pm — 6 Comments

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