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January 2021 Blog Posts (42)

निष्ठुर नगर -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२/१२२२/१२२२/१२



नहीं कुछ गाँव सा सुनता हुआ निष्ठुर नगर

दिखाने घाव मत  जाना सखा निष्ठुर नगर।१।

*

उसे डर है कि उसके हित कमीं आजायेगी

नहीं देता किसी  का  भी  पता निष्ठुर नगर।२।

*

नदी सूखी हुई  कहती  है  प्यासे खेत से

तेरे हिस्से का पानी पी गया निष्ठुर नगर।३।

*

कहाँ तुम बात दुख की यार करते हो भला

खुशी तक में अकेला ही दिखा निष्ठुर नगर।४।

*

निकल पाया न खुद के व्यूह से सायास…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 31, 2021 at 8:59am — 9 Comments

ग़मों से हम सभी आज़ाद होंगे (126 )

ग़ज़ल( 1222 1222 122 )
ग़मों से हम सभी आज़ाद होंगे
मगर शायद क़ज़ा के बाद होंगे
**
यक़ीनन अब जहाँ में फिर कभी भी
न पैदा कैस और फरहाद होंगे
**
ग़लतफ़हमी न पालें इश्क़ में ये
कि जो उश्शाक़ हैं सब शाद होंगे
**
मुहब्बत शय है वो जिसमें ख़ुशी से
कई आबाद और…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 30, 2021 at 11:30am — No Comments

नज़्म (कृषि बिल पर किसानों के शकूक-ओ-शुब्हात)

1222 - 1222 - 1222 - 1222 

ज़मीं होगी तुम्हारी पर फ़सल बेचेंगे यारों हम

मिलेगी तुमको राॅयल्टी न देंगे खेत यारों हम

जो बोएगा वही काटेगा ये बातें पुरानी हैं

फ़सल तय्यार करना तुम मगर काटेंगे यारों हम

ये जोड़ी अब तुम्हारी और हमारी ख़ूब चमकेगी

करो मज़दूरी तुम डटकर करें व्यापार यारों हम 

ज़मीं पर बस हमारी ही हुकूमत होगी अब प्यारो 

मईशत 'उनके' हाथों में न जाने देंगे यारों हम 

रखेंगे हम ज़ख़ीरा कर…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 29, 2021 at 11:46pm — 14 Comments

तेरे कहने से ही क्या हो जाएगा......( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 2122 212



तेरे कहने से ही क्या हो जाएगा 

जो बुरा है वो भला हो जाएगा (1)

जो पुराना जख़्म माज़ी ने दिया

दो ही दिन में क्या नया हो जाएगा (2)

खाद पानी मिलने से ही क्या शजर

वक़्त से पहले बड़ा हो जाएगा (3)

है अलग सबसे ख़ज़ाना प्यार का

ख़र्च कीजै दोगुना हो जाएगा (4)

दोस्ती में दर्द-ओ-ग़म हो या ख़ुशी

जो भी तेरा है मेरा हो जाएगा (5)

क़द अगर छोटा है उसका दोस्तो

मैं झुका तो वो बड़ा…

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Added by सालिक गणवीर on January 29, 2021 at 10:30pm — 11 Comments

ग़म सभी की ज़ीस्त से हों लापता कीजे दुआ

ग़ज़ल( 2122 2122 2122 212 )
ग़म सभी की ज़ीस्त से हों लापता कीजे दुआ
और ख़ुशियों से हो पैहम सामना कीजे दुआ
**
दिल मिलाने के लिए आगाज़ हो इक जश्न का
दिल न कोई अब रहे टूटा हुआ कीजे दुआ
**
नफ़रतों के सब शजर उखड़ें हमारे मुल्क से
और शगुफ़्ता हर शजर हो प्यार का कीजे दुआ
**…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 29, 2021 at 8:30pm — 6 Comments

शायद नहीं. . . . . . . .

शायद नहीं. . . . . . . .
बोलते हैं
और बहुत बोलते हैं
जाने क्या-क्या बोलते हैं
मगर
क्या वही बोलते हैं
जो चाहते हैं बोलना
शायद नहीं…
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Added by Sushil Sarna on January 29, 2021 at 5:39pm — 5 Comments

अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

221   2121  1221  212

ये मानता हूँ पहले से बेकल रहा हूँ मैं,

लेकिन तेरे ख़्यालों का संदल रहा हूँ मैं।

अब होश की ज़मीन पर टिकते नहीं क़दम,

बरसों तुम्हारे प्यार में पागल रहा हूँ मैं।

हैरत से देखते हैं मुझे रास्ते के लोग,

बिल्कुल किनारे राह के यूँ चल रहा हूँ मैं।

मुझको उदासियां मिली है आसमान से,

चुपचाप इन के आसरे में जल रहा हूँ मैं।

साहिल पर जाके तू मुझे मुड़ कर तो देखता,

इक वक्त तेरी रूह की हलचल रहा हूँ…

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Added by Manoj kumar Ahsaas on January 28, 2021 at 11:35pm — 4 Comments

ग़ज़ल

ग़ज़ल(22 22 22 22 22 22 2 )
किसने आज सजाई महफ़िल मेरी यादों की
कौन सफ़ाई का इच्छुक है अपनी आँखों की
**
दर्द बढ़ाती है पीरी का अपनों से दूरी
कौन समझता पीर जहाँ में घायल रिश्तों की
**
बाजू कट जाता है जिसका वो ही ये जाने
कितनी बढ़ती हैं तक़लीफ़ें उसके शानों की
**
कटता है…
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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 28, 2021 at 3:30pm — 11 Comments

शिकायत-एक अद्रश्य अपराध

शिकायत कभी भी खत्म ना होती

कोई जीवन चाहे कुर्बान करें  

खाली दिमाग का सब फितूर है

ये सोच के अपना काम करें ||

 

हर तरह के लोग जहां में

बस मेहनती लोगो की बात करें

कष्ट सहकर भी हार ना माने

जज्बे को उनके सलाम करें ||

 

पद मिले तो अभिमान में भरते

ना बड़े-छोटे का सम्मान करें

संस्कारों की बात कहीं ना

बस अपने कर्मो का गुणगान करें ||

 

कुछ लोगो की आदत बुरी है

उनकी कभी ना बात करें  

हर…

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Added by PHOOL SINGH on January 27, 2021 at 6:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल (तू वतन की आबरू है तू वतन की शान है)

2122- 2122- 2122- 212

तू वतन की आबरू है तू वतन की शान है

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत तुझपे दिल क़ुर्बान है

तेरी जुर्रत से  हुआ नाकाम दुश्मन हिन्द का

नाज़ करता आज तुझपे सारा हिन्दुस्तान है 

हैं मुबारक तेरी गलियांँ, गाँव तेरा, तेरा घर 

मरहबा माँ बाप हैं वो जिनकी तू संतान है

ईद हो या हो दिवाली सरहदों पर ही रहा 

मेरी धड़कन मेरी साँसों पर तेरा अहसान है 

मुल्क पर होते फ़िदा जो वो कभी मरते…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' on January 26, 2021 at 10:16pm — 6 Comments

आशंका :,,,,,,,,,

आशंका :,,,,,,,,,
वृक्ष की सबसे ऊँची टहनी पर
एक लम्बी चोंच वाला पक्षी
चुपचाप
अपनी आँखें बन्द किये
अपने धवल पंख समेटे हुए
शायद किसी तपस्या में लीन था…
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Added by Sushil Sarna on January 26, 2021 at 3:52pm — 7 Comments

नज़्म

बेबाक दिलबरी का आलम न पूँछिये। 

हम से मोहब्बत का बस हुनर सीखिये ।

दिल में लगी हो आग तो सेक लीजिये। 

वरना लगा के दाग यूँ सितम न कीजिये। 

तारीफ़ कीजिये या के…

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Added by DR ARUN KUMAR SHASTRI on January 25, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल-वफ़ा नहीं मिलती

2122 1212 22

1

खा के क़समें वफ़ा नहीं मिलती

ज़ख़्मी दिल की दवा नहीं मिलती

2

बाँध ले बात गाँठ तू यारा

दर्द देकर दुआ नहीं मिलती

3

गाँव की तरह् शह्र में हमको

यार बाद-ए-सबा नहीं मिलती

4

साँस फेरेगी आँख ख़ुद ही सनम

चाहने से कज़ा नहीं मिलती

5

वस्ल की रात ओढ़कर घूँघट

आजकल क्यों हया नहीं मिलती

6

गुनगुना ले जो धड़कनों के सुर

ऐसी नग़्मा-सरा नहीं…

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Added by Rachna Bhatia on January 25, 2021 at 3:54pm — 6 Comments

दो आशीष नया हो भारत - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२/२२/२२/२२



दो आशीष  नया हो भारत

जग में और बड़ा हो भारत।१।

*

आयु बढ़े नित जितनी इसकी

उतना  और  युवा  हो  भारत।२।

*

ज्ञाता हो विज्ञान का लेकिन

साथ ही वेद पढ़ा हो भारत।३।

*

दुख  के  नाले  सब  सूखे  हों

सुख का एक किला हो भारत।४।

*

जिनके घर ढब बन्द पड़े हैं

कहते और खुला हो भारत।५।

*

उनको सबक सिखाना वीरों

जिनकी चाह डरा हो भारत।६।

*

सीमाओं का द्वन्द मिटाकर

दोनों ओर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 25, 2021 at 8:30am — 9 Comments

' दिल '

22 22 22 22 

कैसा अक्कड़ बक्कड़ है दिल..

पा के तुझको अक्खड़ है दिल..

सपने देखे, ऐसे वैसे..

रब्बा जाने कैसे कैसे..

उड़ता फिरे ये बैठे बैठे..

चाहे मिलना जैसे तैसे..

फिरते फ़क़ीर सा फक्कड़ है दिल।

उठते ही जालिम ये सबेरे..

हाथ पैर ये जोड़े मेरे..

चल कर आयें, घर के फेरे..

चिपका गली से, जैसे तेरे..

मोहल्ले का, नुक्कड़ है दिल।

चाहे, तुझसे बातें ये…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on January 24, 2021 at 6:00pm — 4 Comments

ख़ुद की बाबत

2122  2122 22

दिल ने की है तेरी बहुत खिदमत

तू जो समझा है की जिसको आफत

सुर्ख रू होगा सुकूँ ना होगा पर

इस तरह आयेगी तेरी शामत

मैं तो नादानी में हूँ लेकिन तू

तुझ को होने की खुदा है आदत

यूँ की खुद को ही भुला देता हूँ

अब ना पीना आंसुओं का शरवत

तू ने छेड़ा ही कोई क्यों है फिर

गर तू होता ही न खुद से सहमत

इस तरह भी और कोई है क्या

खुद से पूँछे जो की खुद की…

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Added by Aazi Tamaam on January 21, 2021 at 11:00pm — No Comments

शायर सस्ता

22 22 22 22 22

इंसान ही शैतान इंसान ही शाइस्ता

इंसान के होने से है ख़ुदा बाबस्ता

कोई खुदा इंसान से बड़कर नहीं

समझ आयेगा आहिस्ता आहिस्ता

जिस रस्ते सब जाने से ही डरते हैं

लो मैं ही जाता हूँ की उस रस्ता

हो हर इक इंसान बस इंसान ही

क्या कोई भी है नहीं ऐसा रस्ता

जो खुदाओं पे यूँ झगडा़ करते हैं

ऐसे लोगों से अपना क्या रिश्ता

शायद दिन भर ही जलता रहता है

कितना बे-खुशबू है…

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Added by Aazi Tamaam on January 21, 2021 at 11:00pm — No Comments

सच-एक मौन

मौन रहता सच सदा ही, आवाज झूठ ही करता है

कर्म दिखाता सच का चेहरा, झूठ भ्रम को पैदा करता है ||

 

प्रमाण देता झूठ सदा ही, खूब खोखले दावे करता है

परवाह ना सच को किसी बात की, वो तो हौंसले की उड़ान को भरता है ||

 

तकलीफ होती झूठ को हरदम, ना खुशी बर्दास्त ही करता है

आग लगाता कहीं ना कहीं, जब भी शोर वो करता है ||

 

सच सागर सी शक्ति का मालिक, सदा मर्यादा…

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Added by PHOOL SINGH on January 20, 2021 at 9:59pm — 1 Comment

ढूँढा सिर्फ निवाला उसने - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२२/२२/२२/२२



तोड़ के घर का ताला उसने

ढूँढा सिर्फ निवाला उसने।१।

*

लत पीने की ऐसी लगायी

बेच दी माँ की माला उसने।२।

*

खुद औरों के कन्धे पर चढ़

कहता बोझ सँभाला उसने।३।

*

दूध पिलाना था बच्चों को

पर नागों को पाला उसने।४।

*

जिसको हमने माना सूरज

रोका नित्य उजाला उसने।५।

*

जिसको सब खोटा कहते हैं

सिक्का वही उछाला उसने।६।

*

अपनों को ही चोट है मारी

फेंका जब जब भाला…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 20, 2021 at 6:35am — 10 Comments

ग़ज़ल (1222 1222 122)

उजड़कर क्या बसेगा गांव मेरा
यहाँ डालो ना कोई जंग-ए-डेरा

की रातें जा चुकी प्राता है शायद
घनी है तीरगी अब हो सबेरा

नज़र आये भी कैसे कोई गलती
कोई दिखता नहीं इतना घनेरा

ज़हन में देखो है नफ़रत सभी के
मिटे भी तो भला कैसे अंधेरा

तू भी रहता है बस उसके भरोसे
कोई तो आसमां भी हो की तेरा


(अप्रकाशित व मौलिक)

Added by Aazi Tamaam on January 19, 2021 at 2:00pm — 4 Comments

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