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dandpani nahak
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dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-108
"क्या हो क़ासिद से गिला किसलिए कमतर निकला बेवफा तो ये मेरा अपना ही दिलबर निकला झील से देते थे उपमा कभी जिनको यारों आज उन आँखों में अश्कों का समन्दर निकला जल्वा अफ़रोज़ हुआ करते हैं वो छत पे मगर मुझसे शिकवा है कि क्यों घर से मैं बाहर निकला क्या कहूँ…"
10 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion खुशियाँ और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"परम आदरणीय समर कबीर साहब आदाब आपकी बायीं आँख की तकलीफ का सुना ईश्वर से प्रार्थना है की आप शीघ्र स्वस्थ हों"
Jun 16
dandpani nahak commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है
"आदरणीय डॉ अमर नाथ झा जी आदाब बहुत अच्छा प्रयास हुआ है ग़ज़ल का हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Jun 9
dandpani nahak commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post आदमी - ग़ज़ल
"जब मिला आदमी में मिला आदमी वाह क्या कहने भुत उम्दा! आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी"
May 26
dandpani nahak left a comment for Saurabh Pandey
"परम आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी आदाब मैं बता नहीं सकता कितना खुश हूँ कि मेरी रचना को आपने सराहा बहुत शुक्रिया आगे भी आपका स्नेह मिलता रहेगा ऐसी आशा करता हूँ"
May 26
dandpani nahak left a comment for अजय गुप्ता
"आदरणीय अजय गुप्ता जी आदाब आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ी उसे सराहा उसके लिए बहुत शुक्रिया"
May 26
dandpani nahak left a comment for Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)
"आदरणीय डॉ. अमर नाथ झा जी आदाब और बहुत बहुत शुक्रिया आपकी हौसला अफ़ज़ाई का"
May 26
dandpani nahak left a comment for Md. anis sheikh
"आदरणीय मोहम्मद अनीस शेख साहब आदाब हौसला अफजाई का बहुत शुक्रिया"
May 26
dandpani nahak left a comment for Amit Kumar "Amit"
"आदरणीय अमित कुमार 'अमित' जी हौसला अफजाई का बहुत शुक्रिया"
May 26
dandpani nahak left a comment for Dayaram Methani
"आदरणीय दयाराम मेथानि जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया जनाब"
May 24
dandpani nahak left a comment for rajesh kumari
"परम आदरणीया राजेश कुमारी साहिब आदाब बहुत ख़ुशी हुई आपकी टिपण्णी देखकर हौसला बढ़ाने का बहुत शुक्रिया"
May 24
dandpani nahak left a comment for लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी आदाब बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ने के लिए!"
May 24
dandpani nahak left a comment for Samar kabeer
"आदरणीय समर कबीर साहब आदाब हौसला बढ़ाने के लिए बहुत शुक्रिया, सब आपकी कृपा है कृपा दृस्टि बनाये रखें ! आपका आदेश सर माथे पर"
May 24
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-107
"तपती धूप में जैसे दरिया लगता है मुझको ऐसे उसका चेहरा लगता है दिल की धड़कन जाने क्यों बढ़ जाती है शायद उसने मुड़कर देखा लगता है रात गए चुप के छत पे आ जाता है 'चाँद बता तू कौन हमारा लगता है' देख के मुझको तो ये कहता आईना ये तो बिलकुल मेरे…"
May 24
dandpani nahak left a comment for Hariom Shrivastava
"आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी बहुत शुक्रिया हौसला बढाने का आपने ठीक फ़रमाया ' लुटे ' मेरी ग़लती है"
May 12
Hariom Shrivastava commented on dandpani nahak's blog post ग़ज़ल 122 122 122
"वाह,वाहहह,बहुत सुंदर ग़ज़ल। लूटे से कहीं 'लुटे से' तो नहीं?"
May 8

Profile Information

Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

Dandpani nahak's Blog

ग़ज़ल 122 122 122

हमें क्यों किसी से गिला हो
जिसे भी जो चाहे मिला हो

लूटा सा पिटा सा दिखा था
न रहमत का ही काफिला हो

न जाने ये कब तक यूँ ही बस
जिंदगी तिरा सिलसिला हो

उसे क्या खबर हो जहाँ की
इश्क में किसी मुबतिला हो

कहें क्या अगर सुन के सच भी
गया जो वही तिलमिला हो

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on May 3, 2019 at 10:46am — 1 Comment

आओ एक सपना देखो

आओ एक सपना देखो

और उसपे विश्वास करो

कठिन डगर मिले अगर

गौरव का अहसास करो

आओ एक सपना देखो.....



देखो बाज़ जो होता है

फ़िक्र न करता मेघों की

और जंगल में हाथी भी

क्या चिंता करे है बाघों की

उड़ो सारा आकाश तुम्हारा

डैनों का विकास करो



आओ एक सपना देखो.....



लगातार लगे रहने से

पर्बत बी देता रास्ता है

कोई चीज़ असंभव है

कौन यहाँ ऐसा कहता है



नया इतिहास रच बसने को

रोज यूँ ही प्रयास करो



आओ एक… Continue

Posted on March 12, 2019 at 10:09am — 2 Comments

जब क़सम हिंदुस्तान की है

जब क़सम हिंदुस्तान की है
फिक्र फिर किसे जान की है

फ़लक है समूचा तिरंगा
यही बात तो शान की है

ज़माने हुए थी सचाई
तस्वीरें ही पहचान की है

मुद्दतों से तो हम न सुधरे
घडी आज इम्तहान की है

शिखर पर मुल्क हो हमारा
ये ख्वाहिश ही नादान की है

दण्डपाणि नाहक

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on August 15, 2018 at 10:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल : 2122 2122 2122

एक दुजे के अब हबीब नहीं रहे हैं
लोकतंत्र औ हम करीब नहीं रहे हैं

फसल की वाज़िब मिले क़ीमत ऐसी तो
हम किसानों के नसीब नहीं रहें हैं

खत्म करके सब गरीबों को मुल्क से
घोषणा कर दो गरीब नहीं रहे हैं

हर ज़ुल्म हमने सहे हैं मगर फिर भी
यूँ कभी भी बेतर्तीब नहीं रहें हैं

मंदिर मस्जिद एक साथ न हो कभी भी
इस क़द्र तंग तहज़ीब नहीं रहे हैं


दण्डपाणि नाहक
मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on March 21, 2018 at 8:00pm — 5 Comments

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At 11:31pm on January 26, 2019, Samar kabeer said…

प्रयासरत रहें ।

At 10:27am on January 25, 2019, Samar kabeer said…

जनाब नाहक़ साहिब आदाब,

कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522

At 8:07am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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"सादर नमन आदरणीय समर कबीर जी। बहुत बहुत शुक्रिया।"
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"आप का स्वागत है ।"
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