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dandpani nahak
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dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय अमित कुमार 'अमित' जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! खासकर दूसरा शैर बहुत उम्दा बधाई !"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय डॉ नवीनमाणि त्रिपाठी जी प्रणाम बहुत अच्छी गज़ल हुई हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें !"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय मनन कुमार सिंह  जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! "
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय तस्दीक़ अहमद खान साहिब आदाब बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें दूसरा शाइर देखिएगा !बाकि  मतला और सभी शैर अच्छे हुए  हैं bahut बधाई !"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय मोहन बेगोवाल जी प्रणाम बहुत शुक्रिया आपका"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय रवि भसीन ' शाहिद ' जी आदाब ! बहुत शुक्रिया आपने हौसला बढ़ाया आपने अपना कीमती समय दिया ग़ज़ल तक आये शुक्रगुज़ार हूँ आपका !"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय लक्ष्मण धामी ' मुसाफ़िर ' जी बहुत बहुत शुक्रिया आप ने समय निकला ग़ज़ल तक आये"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम ! बहुत बहुत शुक्रिया हौसला बढ़ाने का बाकि सब आपकी कृपा हैं और हमेशा बानी रहे"
Saturday
dandpani nahak commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post तरही गजल - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आदरणीय लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर  जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है  हार्दिक बधाई स्वीकार करें  मतला  अच्छा हुआ है और सातवां शैर तो लाज़वाब हैं वाह क्या कहने बहुत बहुत बधाई "
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"एक रस्मी बात को वादा समझ बैठे थे हम क्या कहा था उसने यारो क्या समझ बैठे थे हम अपनी मंज़िल का उसे रस्ता समझ बैठे थे हम क्या समझना था हमें और क्या समझ बैठे थे हम आज हम पछता रहे हैं राज़ जब उसका खुला एक झूठे शख़्स को सच्चा समझ बैठे थे हम क्या ख़ता इसमें…"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय अजय गुप्ता जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें मतला अच्छा हुआ है और तीसरा शैर ' जब पड़ी लौटानी, तब मालूम ये हम को हुआ, थी अमानत साँसे और तोहफा समझ बैठे थे हम ' क्या कहने ! बाकि गुणी जन राय देंगे ! बहुत badhai"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय मोहम्मद अनीस 'अरमान ' जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई स्वीकार करें मतला अच्छा है और सभी शैर भी अच्छे है पुनः बधाई"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय मुनीश 'तन्हा' जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ! मतला अच्छा है और खासकर आपका दूसरा शैर 'चैन लूटा नींद लूटी और लूटा आशियां इक हंसी चेहरे को भी कैसा समझ बैठे थे हम ' वाह ! कमाल का शैर है बहुत बधाई !"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीया राजेश कुमारी दी प्रणाम ! बहुत अच्छी गज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! मतला क्या खूब कहा है waah! 'पर्दा जल्दी उठ गया आँखों से ये अच्छा हुआ, दिल्लगी को उनकी जाने क्या समझ बैठे थे हम ' वाह! वाह! क्या कहने बहुत अच्छा !"
Saturday
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-116
"आदरणीय रवि भसीन 'शाहिद' जी आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें ! मतला बहुत अच्छा है वाह ! 'ज़िन्दगी ये दर-हक़ीक़त लम्हा लम्हा मौत है, साँस रुकने भर को मर जाना समझ बैठे थे हम ' वाह क्या कहने सच्चा शैर बहुत बधाई…"
Saturday
dandpani nahak commented on Er. Ganesh Jee "Bagi"'s blog post अतुकांत कविता : मैं भी लिखूंगा एक कविता (गणेश बाग़ी)
"वाह ! बहुत सुन्दर कविता ! ह्रदय दे बधाई स्वीकार करें आदरणीय गणेश बागी जी"
Feb 18

Profile Information

Gender
Male
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arang
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arang
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service

Dandpani nahak's Blog

122 122 122 12 ग़ज़ल

कभी इस तरह से भी सोचा है क्या
भला ज़िन्दगी का भरोसा है क्या

यूँ रहता है जैसे यहाँ सदियों तक
रहेगा मगर ये तो धोका है क्या

नकाबों में दिल्ली है सरकारें दो
अजीबो गरीब ये तमाशा है क्या

अगर ना सियासत हो दिल्ली में तो
तभी कुछ किया जा भी सकता है क्या

दिवाली मनाई है दिल्ली ने भी
खुदा ने दिवाला निकाला है क्या

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on November 3, 2019 at 11:41pm — 1 Comment

इस दीवाली

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम

बनकर प्रकाश अँधेरे में उतर जाना तुम



देखना कहीं कोई मासूम

बुझी फुलझड़ियों में गुमसुम

चिंगारी ढूंढ रहा हो तो

उसके पास जाना तुम



रौशन कर दुनिया उसको गले लगाना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम



और देखना घर की झुर्रियाँ सभी

दूर कर के दिलों की दूरियाँ सभी

साथ मिलके सब अपनों के

एक एक कर जलाना मजबूरियाँ सभी



एकता में बल है कितना ये बताना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना… Continue

Posted on October 27, 2019 at 4:24pm — 8 Comments

ग़ज़ल

जरुरी नहीं वो भला हो
अगर सच भी जो बोलता हो

रहे गुण सभी आदमी में
मुसीबत में तो काम का हो

बहुत जानता तो अच्छा
नहीं जानता क्या बुरा हो

हमेशा ही सच्चाई जीते
है कोई जो ना जानता हो

जो मारे है अंदर का रावण
उसी का ही बस दशहरा हो

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on October 18, 2019 at 11:30am — 4 Comments

गज़ल

जरुरी नहीं वो भला हो
मगर जो जैसा है वैसा हो

यही गुण हो बस आदमी में
मुसीबत में तो काम का हो

बहुत जानता है तो अच्छा
नहीं जानता क्यों बुरा हो

हमेशा ही सच्चाई जीते
है कोई जो ना जानता हो

जो मारे है अंदर का रावण
उसी का ही शुभ दशहरा हो

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on October 8, 2019 at 3:07pm — 5 Comments

Comment Wall (5 comments)

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At 10:32am on August 7, 2019, Samar kabeer said…

नाहक़ जी,प्रयासरत रहें ।

At 11:31pm on January 26, 2019, Samar kabeer said…

प्रयासरत रहें ।

At 10:27am on January 25, 2019, Samar kabeer said…

जनाब नाहक़ साहिब आदाब,

कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522

At 8:07am on November 21, 2018, Ahmed Maris said…

Good Day,
How is everything with you, I picked interest on you after going through your short profile and deemed it necessary to write you immediately. I have something very vital to disclose to you, but I found it difficult to express myself here, since it's a public site.Could you please get back to me on:( mrsstellakhalil5888@gmail.com ) for the full details.

Have a nice day
Thanks God bless.
Stella.

At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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