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dandpani nahak
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dandpani nahak commented on Saurabh Pandey's blog post गजल - जा तुझे इश्क हो // -- सौरभ
"आदरणीय सौरभ पाण्डेय ji प्रणाम उम्द: ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें! अनपढ़ा भी कोई शब्द है?"
Mar 29
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-141
"ये नहीं काफ़ी यहाँ सिर्फ़ इरादा करना है अगर जीतना तो ख़ुद पे भरोसा करना तोड़ परबत भी भटक सहरा में दरिया में डूब इश्क़ में हाय अभी और है क्या क्या करना है झुकी हुई नज़र की ये ख़ता माना अब सामने उसको ज़माने के क्या रुस्वा करना आ गया हूँ तेरी महफ़िल से भी उठ…"
Mar 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय भाई लक्ष्मण जी बहुत-बहुत धन्यवाद आपका "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आँखों ही आँखों में ये खुराफ़ात हो गई दिल लेने और देने की भी बात हो गई जम्हूरियत है कहने की बस बात हो गई क्या देख लो ग़रीब की औक़ात हो गई महबूब सामने था मेरा और आँख तर है शुक्र ये ख़ुदाया कि बरसात हो गई हमने कहा ये कब था कि हम हो गए ख़ुदा हमसे भी भूल…"
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय भाई सालिक गणवीर जी नमस्कार!बहुत-बहुत शुक्रिया आपका "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीया रिचा यादव जी बहुत शुक्रिया आपका!सुधारने का प्रयास करता हूँ "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब आदाब बहुत शुक्रिया आपका आपने वक़्त निकाला आवश्यक सुधार की कोशिश करता हूँ सादर "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय नादिर ख़ान जी बहुत धन्यवाद आपका "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"परम आदरणीय समर कबीर साहब प्रणाम! संशोधनों के पश्चात् फिर से कहने की कोशिश करता हूँ!बहुत शुक्रिया "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय नादिर ख़ान साहब नमस्कार अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय संजय शुक्ला जी नमस्कार अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें!"
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय दयाराम मेठानी जी नमस्कार अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय अमित स्वप्निल जी सादर अभिवादन ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है हार्दिक बधाई स्वीकार करें!"
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीया रिचा यादव जी नमस्कार बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें चौथा शैर ख़ासतौर पे बहुत पसंद आया बधाई "
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय तस्दीक़ अहमद ख़ान साहब आदाब बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें!"
Feb 26
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-140
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर ' जी सादर अभिवादन बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई स्वीकार करें "
Feb 26

Profile Information

Gender
Male
City State
arang
Native Place
arang
Profession
service

Dandpani nahak's Blog

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ से ना हो राब्ता कोई
ज़िन्दगी है की हादसा कोई

वो पुराने ज़माने की बात है
अब नहीं करता है वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का है न फ़लसफ़ा कोई

यहाँ सब बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का है टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई

मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on September 27, 2020 at 6:02pm — 13 Comments

ग़ज़ल 2122 1212 22

इश्क़ हो या कि हादसा कोई
सब का होता है कायदा कोई

वो पुराने ज़माने कि बात हैं
अब नहीं करता हैं वफ़ा कोई

ज़िन्दगी के जद्दोजहद अपने
मौत का हैं न फ़लसफ़ा कोई

सब यहाँ बे अदब हैं मेरी जां
अब करे क्या मुलाहिज़ा कोई

दिल का हैं टूटने का ग़म 'नाहक'
था सलामत मुआहिदा कोई


मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on April 9, 2020 at 2:17am

122 122 122 12 ग़ज़ल

कभी इस तरह से भी सोचा है क्या
भला ज़िन्दगी का भरोसा है क्या

यूँ रहता है जैसे यहाँ सदियों तक
रहेगा मगर ये तो धोका है क्या

नकाबों में दिल्ली है सरकारें दो
अजीबो गरीब ये तमाशा है क्या

अगर ना सियासत हो दिल्ली में तो
तभी कुछ किया जा भी सकता है क्या

दिवाली मनाई है दिल्ली ने भी
खुदा ने दिवाला निकाला है क्या

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Posted on November 3, 2019 at 11:41pm — 1 Comment

इस दीवाली

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम

बनकर प्रकाश अँधेरे में उतर जाना तुम



देखना कहीं कोई मासूम

बुझी फुलझड़ियों में गुमसुम

चिंगारी ढूंढ रहा हो तो

उसके पास जाना तुम



रौशन कर दुनिया उसको गले लगाना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना तुम



और देखना घर की झुर्रियाँ सभी

दूर कर के दिलों की दूरियाँ सभी

साथ मिलके सब अपनों के

एक एक कर जलाना मजबूरियाँ सभी



एकता में बल है कितना ये बताना तुम

इस दीवाली सिर्फ दीये मत जलाना… Continue

Posted on October 27, 2019 at 4:24pm — 8 Comments

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At 6:03pm on March 29, 2020, सालिक गणवीर said…
आदरणीय नाहक जी
बहुत आभार है आपका. मैं कोशिश करूंगा कि भविष्य में और भी बेहतर लिख संकू.
At 10:32am on August 7, 2019, Samar kabeer said…

नाहक़ जी,प्रयासरत रहें ।

At 11:31pm on January 26, 2019, Samar kabeer said…

प्रयासरत रहें ।

At 10:27am on January 25, 2019, Samar kabeer said…

जनाब नाहक़ साहिब आदाब,

कृपया ये ग़ज़ल मुझे वाट्सऐप कर दें, मेरा नम्बर है 09753845522

At 8:06pm on December 15, 2017, dandpani nahak said…
122 122 122 122
हजारों किस्म से नुमायाँ हुए हैं
जहाँ से चले थे वहीँ पे खड़े हैं

निगाहें चुराना उन्होंने सिखाया
हमें भी नज़ारे कहाँ देखनें हैं

जिन्होनें हमें लूटना नाहिं छोड़ा
उन्हें क्या बताएं उन्हीं के धड़े हैं

तुम्हारा हमारा यहाँ क्या बचा है
चलो की यहाँ से रस्ते नापने हैं

हमें जी हजूरी नहीं 'शौक' जाओ
तुम्हारे लिए ही नहीं हम बनें हैं

दण्डपाणि नाहक 'शौक'

मौलिक अप्रकाशित
 
 
 

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"सादर नमन आपको आदरणीय । बहुत बहुत आभार आपका ।"
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