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Rupam kumar -'मीत'
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Welcome, रुपम कुमार -'मीत'!

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Rupam kumar -'मीत' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post उसको भाया भीड़ का होकर खो जाना -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. लक्ष्मण जी,ग़ज़ल के प्रयास के लिए बधाई, बह्र-ए-मीर पर ख़ूब शे'र कहे आपने वाह!!"
3 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post जब-जब ख़्वाब सुनहरे देखे - ग़ज़ल
"आदरणीय बसंत कुमार शर्मा जी आदाब, बहतरीन ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ, सादर।"
3 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (न यूँ दर-दर भटकते हम...)
"आ, अमीरुद्दीन साहिब जी, आदाब अच्छी ग़ज़ल हुई वाह!! चौथा शे'र ख़ूब पसंद आया,  "न जाने तुम कहाँ होते न जाने मैं कहाँ होता" यह मिस्रा याद हो गया साहिब वाह!!"
3 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on सालिक गणवीर's blog post नहीं दो चार लगता है बहुत सारे बनाएगा.( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)
"आ, सालिक सर्, प्रणाम बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है, और दूसरा शे'र क्या ही कहने वाह!! फ़लक पर वो नये दो-तीन सय्यारे बनाएगा यह मिसरा विज्ञान के हिसाब से ठीक नहीं, क्यों कि प्लैनेट फ़लक में नहीं कहकशाँ में होता है, जैसे हम सब मिल्की वे गैलेक्सी में रहते…"
3 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on अमीरुद्दीन 'अमीर''s blog post ग़ज़ल (ज़िन्दगी भर हादसे दर हादसे होते रहे...)
"आ, अमीरुदीन साहिब जी, आदाब बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही आपने वाह वाह!! मुक़म्मल ग़ज़ल पंसद आई साहिब वाह!! बहुत दुआएँ आपको सलामत रहें और लिखते रहें।"
4 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Nilesh Shevgaonkar's blog post ग़ज़ल नूर की- जिन की ख़ातिर हम हुए मिस्मार; पागल हो गये
"आ, निलेश साहिब जी, प्रणाम शे'र दर शे'र दाद पेश कर रहा हूँ। बधाई स्वीकार कीजिए, अच्छी ग़ज़ल हुई आपकी।। मिस्मार का मतलब?"
4 hours ago
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा और हँसते हुए दुनिया से गुज़र जाऊँगा [1]जो सिला मुझ को मिला है यहाँ सच बोलने से अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा [2]रात को ख़्वाब में आऊँगा फ़रिश्ते की तरह और आँखों से तेरी सुब्ह उतर जाऊँगा [3]ख़ून छन छन के निकलता है कलेजे से मेरेरोग ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा [4]सामना होने पे पूछेगा तू , पहचाना मुझे? गर मैं पहचान भी लूँगा तो मुकर जाऊँगा [5]तेरी दहलीज़ पे आया हूँ मुहब्बत के लिए ख़ाली कासे को उठा के मैं किधर जाऊँगा [6]किसी की आँख…See More
15 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"आ, साहिब ठीक मैं यही कर देता हूँ, आपका बहुत शुक्रिया।"
17 hours ago
Samar kabeer commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"'जो सिला मुझको मिला है तुझे सच बोलने से' अभी बात वहीं की वहीं है, इसे यूँ कर सकते हैं:- जो सिला मुझको मिला है यहाँ सच बोलने से'"
17 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"आ, मोहतरम समर कबीर साहिब, प्रणाम, आपका बहुत शुक्रिया, मेरा इन्तिज़ार ख़त्म हुआ, दिल से शुक्रिया साहिब। दूसरे शेर को यूँ कर दूँ तो जो सिला मुझको मिला है तुझे सच बोलने से अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा 'मरज़' को 'रोग' कर…"
17 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"आ, नीलेश साहिब, प्रणाम, आपकी बातों पर अमल करूँगा, मैं इस मंच का पूरा फ़ायदा लेना चाहत हूँ, आपकी इस्लाह का आगे भी  इंतिजार रहेगा,  आपने जो बताया शे'र लिख कर उसको गुन गुना लिया कीजै, साहिब इस से मेरे शे'र  में रवानी आएगी, लेकिन…"
17 hours ago
Rupam kumar -'मीत' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"आ, अमीरुद्दीन साहिब,आदाब ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और हौसला अफ़ज़ाई के लिये बेहद मशकूर हूँ। सादर।"
18 hours ago
Samar kabeer commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें । 'जो सिला मुझ को मिला है तुझे सच बोलने पर' इस मिसरे पर जनाब निलेश जी से सहमत हूँ । 'मर्ज़ ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा' इस मिसरे में सहीह…"
18 hours ago
Rupam kumar -'मीत' posted a blog post

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा और हँसते हुए दुनिया से गुज़र जाऊँगा [1]जो सिला मुझ को मिला है यहाँ सच बोलने से अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा [2]रात को ख़्वाब में आऊँगा फ़रिश्ते की तरह और आँखों से तेरी सुब्ह उतर जाऊँगा [3]ख़ून छन छन के निकलता है कलेजे से मेरेरोग ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा [4]सामना होने पे पूछेगा तू , पहचाना मुझे? गर मैं पहचान भी लूँगा तो मुकर जाऊँगा [5]तेरी दहलीज़ पे आया हूँ मुहब्बत के लिए ख़ाली कासे को उठा के मैं किधर जाऊँगा [6]किसी की आँख…See More
Saturday
Nilesh Shevgaonkar commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"आ. रूपम जी,ग़ज़ल अच्छी हुई है, बधाई .. अब थोड़ी खरी खरी ,, वो भी इसलिए कि आप के अब तक के लेखन से बड़ी उम्मीद जगती है ..१)  ग़ज़ल का वाक्य विन्यास अगर आमफ़हम है तो वो ग़ज़ल अच्छी से बेहतरीन बन जाती है.. आप का मतला देखें ..ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर…"
Friday
अमीरुद्दीन 'अमीर' commented on Rupam kumar -'मीत''s blog post ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')
"जनाब रूपम कुमार जी आदाब, ग़ज़ल के सातवें और आठवें शे'र लाजवाब हुए हैं हार्दिक बधाई स्वीकार करें। सादर। "
Thursday

Profile Information

Gender
Male
City State
Motihari
Native Place
Bihar
Profession
Student
About me
मुझे तो सभी बोलते है कि लड़का भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है -'मीत'

Rupam kumar -'मीत''s Blog

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा (रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)

ज़हर पी के मैं तेरे हाथ से मर जाऊँगा

और हँसते हुए दुनिया से गुज़र जाऊँगा [1]

जो सिला मुझ को मिला है यहाँ सच बोलने से

अब तो मैं झूट ही बोलूँगा जिधर जाऊँगा [2]

रात को ख़्वाब में आऊँगा फ़रिश्ते की तरह

और आँखों से तेरी सुब्ह उतर जाऊँगा [3]

ख़ून छन छन के निकलता है कलेजे से मेरे

रोग ऐसा है कि कुछ रोज़ में मर जाऊँगा [4]

सामना होने पे पूछेगा तू , पहचाना मुझे?

गर मैं पहचान भी…

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Posted on October 15, 2020 at 5:30pm — 8 Comments

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी (~रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 1212 / 1122 / 1212 / 22 (112)

अज़ाब-ए-हिज्र में सुख-दुख के गीत गाए भी

हम उनकी याद में रोए भी मुस्कुराए भी [1]

ख़ुदा ने ख़ल्क़ किया है चराग़ जैसा हमें

वही जलाए हमें फिर वही बुझाए भी [2]

अजीब साल ये गुज़रा हमारी जिंदगी में

ख़ुदा करे न दुबारा कभी फिर आए भी [3]

हमारे यार का अंदाज़-ए-इश्क़ सबसे जुदा

कभी हँसाए वो हमको कभी रुलाए भी [4]

गुलाब जैसे लबों से वो हमको चूमता है

निशान प्यार के सीने से फिर मिटाए…

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Posted on September 27, 2020 at 1:00am — 17 Comments

अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र-22/22/22/22/22/2

अब से झूटा इश्क़ नहीं करना जानाँ

और किसी को मत देना धोखा जानाँ [1]

जब आँखों को दरिया करने का मन हो

तब मेरी रूदाद-ए-ग़म सुनना जानाँ [2]

दिन से रात तलक मैं तुमको रोता हूँ

तुम भी मुझको आठ-पहर रोना जानाँ [3]

अपने हाथ के कंगन जा पर रखना तुम

वाँ पर मेरी ग़ज़लें मत रखना जानाँ [4]

तुम रिश्तों में मत ढूँडो ख़ुशियाँ सारी

सीखो ख़ुद से मिलकर ख़ुश होना जानाँ [5]

आज जला दी वो…

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Posted on September 16, 2020 at 5:30am — 10 Comments

देख तूफ़ाँ की ये रफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे (-रूपम कुमार 'मीत')

बह्र- 2122 1122 1122 22(112)

देख तूफ़ाँ की ये रफ़्तार ख़ुदा ख़ैर करे

घर की कमज़ोर हैं दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

कर न दें मुफ़लिसों पे वार ख़ुदा ख़ैर करे

चंद पैसों के तलबगार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लौटने का मेरा है ख़ुद में इरादा लेकिन

"ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे" [3]

नौकरी भी नहीं है हाथ में उस पर मेरा

हर समेस्टर गया बे-कार ख़ुदा ख़ैर करे [4]

मुझको हर सम्त से घेरा हुआ है दुश्मन ने

और गर्दन पे है तलवार…

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Posted on August 27, 2020 at 8:00am — 6 Comments

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At 5:49pm on July 3, 2020, Chetan Prakash said…

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