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Mohit mishra (mukt)
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Mohit mishra (mukt) posted a blog post

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|पुनः कुठाराघात सह रहीं, माँ भारती कुछ वर्षों से । पीड़ादायी दंश दे रहे , नवल विषधर कुछ अरसे से। फण पर फणधर के नर्तन को, हलधर के भाई कम हैं। हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर, देख राजनीति का अंधपतन। सोच दुर्दशा आम जन-जन की , ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन। मोहित अर्जुन को समझाने को , गीता की वाणी कम है। हिमगिरि की ऑंखें नम है।सूर्य भारत भू के जो हैं, अस्ताचल को अग्रसर हैं, गहन तम के नए प्रवर्तक , निष्कंटक प्रभावान प्रखर हैं। दमन शोषण के दो पाटों में…See More
5 minutes ago
Neelam Upadhyaya commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय मोहित मिश्रा जी नमस्कार।  अच्छी रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें।  माननीय समर कबीर साहब की अभ्युक्तियों का संज्ञान लें। "
18 hours ago
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय समर सर उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन का बहुत बहुत आभार"
yesterday
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"आदरणीय गुमनाम जी सराहना के लिए अत्यंत शुक्रिया"
yesterday
Samar kabeer commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"जनाब मोहित मिश्रा मुक्त जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । जहाँ जहाँ 'आँखे नम है' लिखा है वहाँ "आँखें नम हैं" कर लें । पांचवीं पंक्ति में 'अरसों' शब्द को "अरसे" करना उचित होगा ।"
yesterday
gumnaam pithoragarhi commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)
"वाह बहुत खूब......"
Monday
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|पुनः कुठाराघात सह रहीं, माँ भारती कुछ वर्षों से । पीड़ादायी दंश दे रहे , नवल विषधर कुछ अरसे से। फण पर फणधर के नर्तन को, हलधर के भाई कम हैं। हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर, देख राजनीति का अंधपतन। सोच दुर्दशा आम जन-जन की , ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन। मोहित अर्जुन को समझाने को , गीता की वाणी कम है। हिमगिरि की ऑंखें नम है।सूर्य भारत भू के जो हैं, अस्ताचल को अग्रसर हैं, गहन तम के नए प्रवर्तक , निष्कंटक प्रभावान प्रखर हैं। दमन शोषण के दो पाटों में…See More
Monday
Mohit mishra (mukt) commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल...पिछले कुछ दिनों से-बृजेश कुमार 'ब्रज'
"उम्दा ग़ज़ल आदरणीय जोश में है भीड़ 'ब्रज' आक्रोश भी है बस नहीं है जान पिछले कुछ दिनों से बधाई"
Friday
Mohit mishra (mukt) commented on Rakshita Singh's blog post तुम्हारे स्पर्श से....
"आदरणीय रक्षिता जी नमस्कार ,मर्मस्पर्शी रचना हुई है , बधाई"
Friday
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त
"आदरणीय बृजेश जी ,हौसलाअफजाई का शुक्रिया"
Friday
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त
"आदरणीया रक्षिता सिंह जी नमस्कार ,आपकी बहुमूल्य टिप्पड़ी के लिए बहुत बहुत आभार"
Friday
Mohit mishra (mukt) commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त
"आदरणीय गुमनाम जी ,रचना पर उपस्थिति और घनावलोकन का आभार। मुझे ग़ज़ल के अरकान नहीं समझ आते अतः त्रुटि सम्भव है। आगे की कोशिशों में और बेहतर करने का प्रयास रहेगा"
Friday
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त
"अच्छी कोशिश भाई..अरकान नहीं लिखे हैं आपने..जो आदरणीय गुमनाम जी ने बताया वही हैं तो उनकी बातों का संज्ञान लें.."
Friday
Rakshita Singh commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त
"आदरणीय मोहित जी नमस्कार, बहुत बेहतरीन गजल ... हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Friday
gumnaam pithoragarhi commented on Mohit mishra (mukt)'s blog post ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त
"भाई जी अच्छी ग़ज़ल हुई है.... क्या अरकान 1222 1222 1222 1222 तो अरमान-निशान क़ाफ़िए मेल नहीं खाते । गुणीजन भी कुछ कहें....."
Jun 12
Mohit mishra (mukt) posted a blog post

ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा ,मगर इस खंडहर में अब तलक गुमान बाक़ी है।सिवाए गर्द के क्या कुछ दिया ऐ जिंदगी मेरी ,हाँ इस धुंध के भी मुझपे कुछ…See More
Jun 11

Profile Information

Gender
Male
City State
allahabad
Native Place
allahabad univercity
Profession
student
About me
SIDHA SADA AUR SULJHA HUA

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At 10:14pm on November 28, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

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 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

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हिमगिरी की आँखे नम हैं(कविता)

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

पुनः कुठाराघात सह रहीं,

माँ भारती कुछ वर्षों से ।

पीड़ादायी दंश दे रहे ,

नवल विषधर कुछ अरसे से।

फण पर फणधर के नर्तन को,

हलधर के भाई कम हैं।

हिमगिरि की ऑंखें नम हैं|

संस्कृतियों की प्राचीन धरा पर,

देख राजनीति का अंधपतन।

सोच दुर्दशा आम जन-जन की ,

ब्याकुल-ब्यथित-द्रवित है मन।

मोहित अर्जुन को समझाने को ,

गीता की वाणी कम है।

हिमगिरि की ऑंखें नम है।

सूर्य भारत भू के…

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Posted on June 18, 2018 at 6:00pm — 5 Comments

ग़ज़ल (प्रथम प्रयास ):-मोहित मुक्त

अभी भी तुमसे मिलने के कई अरमान बाक़ी हैं ,

मेरी आबादियों के अब तलक निशान बाक़ी हैं।

मैं नंगे पैर शोलों पर अभी भी चल रहा लेकिन ,

मेरे पांवों के छालों में हलक तक जान बाक़ी है।

गले में कस गयीं हैं रस्सियाँ फांसी के फंदे की ,

मगर जिन्दा हूँ क्योंकि मौत का फर्मान बाक़ी है।

फ़क़त कुछ धुप से माना कि मैं सूखता समंदर हूँ ,

मगर अश्कों की बूंदों में बहुत अहजान बाक़ी हैं।

भले ही खाक में मिलने लगा है आसियाँ मेरा…

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Posted on June 10, 2018 at 10:16pm — 6 Comments

भला कैसे(अतुकांत):- मोहित मुक्त

दूर क्षितिज में-

तुम्हारे अधर की ज्यों रंगत चुराकर -

प्राची के प्रान्त पर रक्तिम सी आभा,

हो बिखरने को आकुल तभी मीत मेरे,

मुझे चूमकर तुम जगाने लगो ,

कहो कैसे गाऊँ शुभाषित सुबह के !

प्रणय-छंद ना फिर उच्चारा करूं।



शशि मुख पर-

छिटक आये केश-वेणी से खुल-

प्यारे लट को झटककर झुंझलाती तुम,

हस्त-व्यस्त हों कहीं, होके लाचार सी ,

तुम पुकारो मुझे जब बड़े प्यार से ,

मैं भला कैसे उन्माद से छूट कर ,

रुक जाऊं! तुम्हे ना सताया करूं।

ऐ…

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Posted on June 1, 2018 at 3:15pm — 8 Comments

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते:-मोहित मुक्त

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

आंखे गातीं अनुराग राग ,

जी से मिट जाता विराग ,

उन्माद भरे किसलय दोनों ,

अधरों पर ढुल-ढुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

अनुकंपित होता प्राण सखी ,

स्पंदन युत निर्वाण सखी ,

विप्लव, विषाद सूनी रातें ,

सब लम्हों में धुल-धुल जाते ,

जो तुम मुझमे घुल-घुल जाते।

मदमाते पुष्प नवीन विशद ,

उमड़ा आता मधुभावित नद ,

पलकों के अज्ञात-ज्ञात ,

अवगुंठन सब खुल-खुल…

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Posted on May 12, 2018 at 10:22pm — 4 Comments

 
 
 

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गंगा सूख गयी - लघुकथा –प्यारी "माँ"तुम्हारी ऊँच नीच की तमाम नसीहतों को दरकिनार करते हुए, मैंने अपने…See More
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कश्मीर अभी ज़िंदा है आँसू गैस मेंडल झील की बर्फ में फैले ख़ून मेंजवान बेटे की मौत पर दहाड़े मारती माँ…See More
3 hours ago
gumnaam pithoragarhi commented on gumnaam pithoragarhi's blog post ग़ज़ल .....
"शुक्रिया एक नई जानकारी के लिए,,,,,,"
9 hours ago
SudhenduOjha left a comment for Rakshita Singh
"आदरणीया सुश्री रक्षिता सिंह जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद...."
11 hours ago
SudhenduOjha left a comment for Neelam Upadhyaya
"आदरणीया सुश्री नीलम उपाध्याय जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद.... सुधेन्दु ओझा"
11 hours ago
SudhenduOjha commented on SudhenduOjha's blog post जिसकी चाहत है उसे हूर औ जन्नत देदे।
"आदरणीया सुश्री नीलम उपाध्याय जी, नमस्कार। रचना आपको पसंद आई, धन्यवाद...."
11 hours ago
Samar kabeer commented on Mahendra Kumar's blog post बलि (लघुकथा)
"जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब, आपकी लघुकथाएँ हमेशा मुझे पसन्द आती हैं,ये लघुकथा भी उसी श्रेणी की है,…"
11 hours ago
Samar kabeer commented on बसंत कुमार शर्मा's blog post लट जाते हैं पेड़- एक गीत
"जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,बहुत ख़ूब वाह, कितना सुंदर गीत लिखा आपने, मज़ा आ गया,इस प्रस्तुति पर…"
11 hours ago
Samar kabeer commented on Neelam Upadhyaya's blog post हाइकू
"मुहतरमा नीलम उपाध्याय जी आदाब,बहुत उम्दा हाइकू लिखे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
11 hours ago
Samar kabeer commented on SudhenduOjha's blog post जाहिल हैं कुछ लोग, तुम्हें काफ़िर लिखते हैं।
"कृपा कर इस ग़ज़ल के अरकान लिखने का कष्ट करें ।"
11 hours ago
Samar kabeer commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post हवाओं से रूबरू (लघुकथा)
"जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,उम्दा लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।"
11 hours ago

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