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ओबीओ लाइव महोत्सव अंक 59 की समस्त रचनाओं का संकलन

1.आ० राजेश कुमारी जी

ग़ज़ल

वक़्त बड़ा बलवान सुना है भैया जी

छूट गया जो साथ डुबोता नैया जी

 

कर लो पूरे काम न छोड़ो कल पर तुम

करवायेगा वरना ताता थैया जी

 

मँहगाई में सौ-सौ नखरेबाज हुआ

कितना हाय कमीना आज रुपैया जी

 

खाली जेब लिए जाते  हो काटेगा

कुर्सी पर जो बैठा लाल ततैया जी

 

ढोंगी आसा राम गया कारा भीतर

अगली बारी में है राधे मैया जी

 

कल जो रास  रचाते पूजे जाते थे

खाते आज पुलिस की मार कन्हैया जी

 

घरवाली गलती पर बेलन से पीटे

आज नहीं वो भोली भाली गैया जी

 

अच्छे-अच्छे जाकर खुद को खो बैठे

देखो आज  सियासत भूलभुलैया जी

 

दुनिया भर में ग़ज़लों का डंका बजता

टिमबकटू हो  चाहे  झुमरितलैया जी  

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2.आ० शिज्जू शकूर जी

221 2121 1221 212
यूँ जागने की मुझको सज़ा दे गया समय
आँखों को इंतज़ारे सबा दे गया समय


बिखरे हुये तमाम ख़यालात को समेट
इक काम इनको बांधने का दे गया समय

जब हाल पर मेरे तरस आया कभी इसे
खुशियाँ जहाँ से चंद छुपा दे गया समय

गुज़रे पलों को याद किया तो लगा मुझे
मा'नी ग़ज़ल को एक नया दे गया समय


माहौल एक नर्क़ सा मौत और ज़िंदगी
इतनी सी उम्र में ही ये क्या दे गया समय

*संशोधित रचना 

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3.आ० लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी

गीत

समय चक्र को जानिये, समय बड़ा बलवान

 

समय समय की बात है,समय समय का फेर

गीदड़ भी बनता कभी,  कैसा बब्बर शेर |

कोयल साधे मौन जब, पावस का हो भान,

समय चक्र को जानिये, समय बड़ा बलवान |

 

अवसर तो सबको मिले, समझे जो संकेत,

जो न इसे पहचानते, दोष भाग्य को देत |

सजग सदा रखते रहे, सही समय का ज्ञान.

समय चक्र को जानिये, समय बड़ा बलवान |

 

जिस पल साधे काम को, उस पल ही उत्कर्ष

सार्थक श्रम बदले समय, मन में होता हर्ष |

कठिन राह पर धैर्य से, सफ़र लगे आसान

समय चक्र को जानिये, समय बड़ा बलवान |

 

पो फटने के साथ ही,शुभ हो समय व्यतीत,  
गया वक्त मिलता नहीं, बीता समय अतीत |

समय चक्र गतिशील है, पल पल का हो भान,

समय चक्र को जानिये, समय बड़ा बलवान |

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4.आ० अशोक कुमार रक्ताले जी

ताटंक छंद.

कभी दिखाता सत्य अहिंसा, कभी घाव भी देता है.

कभी बाँधता प्रेम पाश में, कभी प्राण हर लेता है,

रात दिवस जो चलती रहती, उन साँसों का माली है,

पूरे जीवन हमने देखा ,  समय बड़ा बलशाली है ||

 

कभी बैर बन रहता दिल में, कभी मित्र सा होता है,

याद बने तो फिर आँखों में , सदा चित्र सा होता  है,

यही रंक कर देता मन को , यही प्रीति  भर देता है,

बदल गया तो मिली हार को, समय जीत कर देता है ||

*संशोधित 

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5.आ० प्रतिभा पाण्डेय जी

वो दिन फिर लौटा ला

अम्मा की छत पर तू
पसरा पड़ा
बड़ियों के संग में
रहा सूखता .
प्रेम की पाती कभी
तू बना
इस छत से उस छत
रहा कूदता.
बाबा के गुस्से से
बचके कभी
अम्मा के आंचल में
छिपता रहा.

समय तू लगता था
नटखट बडा
जा जाके वो दिन फिर
लौटा ला.

छिप छिपके होती थी
बातें कई
सखियों की चुहल वो
भेद भरी .
यौवन की दहलीज
से झांकता
अनबूझे एहसासों
को मापता .
दर्पण में दिखता था
चेहरा नया
पूरा का पूरा था
रंगों भरा .

समय तू लगता था
रस में पगा
जा, जाके वो दिन फिर
लौटा ला.

बाहों में लिपटी वो
गदबद छुअन
निश्छल आँखों बसा
पूरा चमन .
किलकारियों में तू
गूंजा किया
ममता की लसपस में
फूला रहा
दिन भर थका रातों
जगा जगा
रहता था तब तू,
उम्मीदों भरा .

समय तू लगता था
गुड़ियों जैसा
जा, जाके वो दिन फिर
लौटा ला.

बालों की चांदी में
अब है रुका
चेहरे की सिलवट में
क्यों है फंसा.
खाली कमरे में बस
तू और मैं
अपनों की राहों को
तकते रहे.
समय तू लगता है
जिद्दी बडा
ज़ख्मों को भरता और
देता हुआ .

फिर भी तू लगता है
अब भी भला
तेरे पहियों से ही
जीवन चला.

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6.आ० मिथिलेश वामनकर जी

 ग़ज़ल

जमाने की ये तुहमत भी समय के साथ बदलेगी

मुहब्बत की इबारत भी समय के साथ बदलेगी

 

अभी वैसे बदलना है बहुत मुश्किल मेरे यारां

अगर बदली तो आदत भी समय के साथ बदलेगी

 

बशर भी आँख पे पट्टी लगाए आजकल फिरते 

यकीं जानो अकीदत भी समय के साथ बदलेगी

 

इसी उम्मीद में हमने गुजारी उम्र अपनी तो

कभी उनकी तो नफरत भी समय के साथ बदलेगी

 

जमीं पर रोज उगते जा रहे कितने खुदा देखो

खुदा तेरी इबादत भी समय के साथ बदलेगी

 

उन्हें भी तो शबाब आये हुए है यार कितने दिन 

नयन की ये शरारत भी समय के साथ बदलेगी

 

अभी बेचैन दिल को चैन आया है जरा ठहरो

बदन की ये हरारत भी समय के साथ बदलेगी

 

अभी आये हो शहरों में यहाँ का रंग चढ़ना है  

अरे भाई सदाकत भी समय के साथ बदलेगी

 

बरस गुजरे, यहीं हम मान के बैठे रहे साहिब

कभी तो ये हुकूमत भी समय के साथ बदलेगी

 

किये तकसीम अपने ही उजाले इस भरोसे में

दिलों में है जो जुल्मत भी समय के साथ बदलेगी

 

उसे उम्मीद की झूठी नसीहत दे रहा हूँ मैं

मेरी बेटी हिफाज़त भी समय के साथ बदलेगी

 

अभी आये है, जिद्दी है, उन्हें दुनिया समझने दो

खुदी बच्चों की हरकत भी समय के साथ बदलेगी

 

कहो किस बात पर इतना अजी मगरूर रहते हो

तुम्हारी शानो-शौकत भी समय के साथ बदलेगी

 

वतन की सरपरस्ती का सही मतलब बदल देंगे

कफ़न बदले शहादत भी समय के साथ बदलेगी

 

किसी मुफलिस को ऐसे ही तसल्ली दे रहा हूँ मैं

कि जीने की मशक्कत भी समय के साथ बदलेगी

 

जिए जा जिंदगी को मस्त हो के बेधड़क यारां

जो सिर पे है मुसीबत भी समय के साथ बदलेगी

 

जमाने की मलामत को उठा के फेंक देंगे फिर

अगर अपनी तबीयत भी समय के साथ बदलेगी

 

उठाकर हाथ सरहद पर खड़े हो जाओ इंसानों

मुहब्बत में अदावत भी समय के साथ बदलेगी

 

न इतना हो परेशां ऐ मेरी जाने-ग़ज़ल सुन तो

जहाँ में तेरी कीमत भी समय के साथ बदलेगी

 

लगा दिल मसखरी से तो परी क्या चीज है हमको

बुजुर्गों की कहावत भी समय के साथ बदलेगी

(संशोधित ग़ज़ल )

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7.आ० तेजवीर सिंह जी

शिला लेख -

क्या लिखते रहते हो तुम,रेत पर,

उंगलियों से,समुद्र के किनारे !

कितनी देर टिकेगी, तुम्हारी यह लिखावट, कुछ पता है,

एक पल ,एक पहर या फ़िर एक दिन!

कल जब तुम आओगे, यहॉ दोबारा,

 तो शायद इसे नहीं पाओगे!

फ़िर क्यूं लिखते हो, यह सब!

क्या मिलेगा, समय बरबाद करके!

लिखने का शौक है, लिखने का जज़्बा है,

लिखने की चाहत है,लिखने का ज़ुनून है,

लिखने की काबिलियत है ,

तो ज़रूर लिखो!

मगर रेत पर नहीं,

पहाडों पर लिखो ,पत्थरों पर लिखो,

जो अमिट रहे,सदियों तक चले,

जो कई पीढियां पढें, तुम्हारी आनेवाली नस्ल पढे और तुम्हें याद करे!

ऐसा कुछ लिखो!

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8.आ० डॉ० विजय शंकर जी

समय
निरंतर , अनवरत ,
अथाह है,
न उसका आदि है ,
न अंत है।
वह अनंत है।
ईश्वर भी अनादि ,
निरंतर है , अनंत है।
सब कुछ उसी में
अन्तर्निहित है।
जीवन ,
एक प्री-पेड
कार्ड है , जिसका
समय फिक्सड है।
समय गतिमान है
स्वयं एक गति है ,
समय ,
हर चीज़ का
एक आदि है , अंत है।
समय , स्वयं स्थाई है ,
अशेष है ,
बाकी सब अस्थायी है ,
शून्य अवशेष है।
समय ,
गुजरता ,
अच्छा लगता है।
मुट्ठी में रेत सा
फिसलता है ,
पल पल फिसलता है ,
लगता भी फिसलता है ,
फिर भी अच्छा लगता है।
समय बदलता है ,
समय बदलता ,
अच्छा लगता है ,
समय, कब , किसी की
प्रतीक्षा करता है ,
पर समय की प्रतीक्षा
करना , अच्छा लगता है।
हम सब समयाधीन हैं ,
ईश्वर के आधीन हैं।
न ईश्वर हमारे वश में है
न समय।
फिर भी कुछ लोग
दावा करते हैं ,
समय को बदलने का।
समय बदलने का दावा एक खेल है ,
एक लुभावना प्रलोभन है ,
अभी तक नहीं बना ऐसा
कोई यंत्र है ,
तंत्र है ,
तंत्र का मंत्र है।
समय का सदुपयोग ही
जीवन का मूलमंत्र है।

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9.श्री सचिन देव जी

समय – पर चंद – दोहे

लाख टके की बात ये, रखिये हरदम ध्यान 

ज्ञानी-ध्यानी कह गये,  समय बड़ा बलवान

 

पंख लगा कर भागता, तेज समय रफ़्तार

वापस फिर आये नही, अगर गया इक बार  

 

समय बड़ा ही कीमती, मत करिए बरबाद    

कभी न आये लौटके,  आये इसकी याद 

 

समय रहे न एक सा,  हरपल बदले रूप

सावन की बारिश कभी, गर्मी की है धूप 

 

जीवन में हर एक पर, पड़े समय प्रतिकूल 

हिम्मत से कर सामना, बना इसे अनुकूल

 

सही समय जो जागता, उसके सर पर ताज

मेहनत वालों का सदा, रहता  जग में राज 

 

सुख में तो लाखों मिलें, ऐसी जग की रीत 

बुरे समय जो साथ दे, वो ही सच्चा मीत 

 

आता है सबका समय, थोड़ी देर-सवेर 

घूरे के दिन भी फिरें, यही समय का फेर 

*संशोधित 

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10.आ० सुशील सरना जी

समय के पुल पर ........

समय के पुल पर 
इक दूसरे का सानिध्य पाने को 
बेआवाज़ दौड़ते कदम

आंतरिक दूरी मिटाने को 
धड़कनों की रफ़्तार से तेज़ 
पदचापों की आवाज़ से 
थरथराता पुल


बेबस लम्हों के बिखराव को 
समेटने की कोशिश में 
व्योम की नदी में 
स्वयं के प्रतिबिम्ब को देख 
सहम जाता है

समय निष्ठुर है 
वो न ठहरता है न सहमता है 
परिणाम से विमुख 
बस अपनी गति से चलता ही रहता है

हमारे और तुम्हारे मध्य की दूरी 
समय के पुल पर 
बढ़ती ही गयी 
साँसों ने साथ छोड़ दिया 
जिस्म का मोह छोड़ दिया 
मगर सानिध्य की लालसा 
बढ़ती ही रही 
कम न हुई

अंतहीन समय के पुल पर 
कदम दौड़ते ही रहे 
पुल कांपता रहा 
हर कदम सांस घटती रही 
मगर निर्मोही  दूरी बढ़ती रही 
बस बढ़ती ही रही

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11.आ० सरिता भाटिया जी

समय समय पर तुम अगर ,रखो समय का ध्यान |
समय बहुत अनमोल है ,खुद ही होगा भान ||


अगर समय पर आप भी, लेंगे शुद्ध आहार | 
निश्चय होंगे आपके, सच्चे शुद्ध विचार ||

 

आता है सबका समय, यह मत भूलो यार | 
जीतोगे तुम एक दिन ,नहीं मानना हार ||

 

आता नहीं है लौट के , बीत गया जो काल |
समय बड़ा ही कीमती, रखना इसे सम्भाल ||

 

समय न आये लौट के, रखना इतना याद |
इसीलिए करना नहीं, समय कभी बरबाद ||

 

रहता नहीं है एक सा, समय बदलता रंग |
खुशियाँ देता है कभी, कभी करे यह तंग ||


कीमत इसकी जान लो ,समय बहुत बलवान 
करे कभी अपमान यह ,कभी दिलाये मान ||


रंक बने राजा कभी , समय बने जागीर |
पड़े समय की मार जो ,राजा बने फ़क़ीर |


सुख में देते साथ सब ,दुख में तोड़ें प्रीत |
दुख में देते साथ जो ,वो ही सच्चे मीत ||

 

जीवन में रहता नहीं ,समय सदा अनुकूल |
धीरज धरना तुम अगर, समय मिले प्रतिकूल ||

 

समय फिसलती रेत है, मुट्ठी चाहे बंद 
हाथ धरे बैठा रहा, किन्तु समय पाबंद ||

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12.आ० अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी

जो दुनिया से दूर जा चुके, लौट कभी ना आयेंगे।                          

सत्य यही है इस धरती का, आयें हैं सो जायेंगे।।

 

थमता नहीं समय का पहिया, हर पल को भरपूर जियें।

जिया नहीं हमने जिस पल को, फिर न दुबारा आयेंगे।।

 

धर्म विरुद्ध न अर्थ कमायें, संचय हम ज़्यादा न करें।                                   

आयेगा जब वक्त बिदा का, हाथ पसारे जायेंगे।।

 

समय पूर्व, योग्यता से ज़्यादा, धन वैभव पद नाम मिले।                    

ऐसी गंदी राजनीति हम, और कहीं ना पायेंगे।।

 

बुरे समय में मित्र पड़ोसी, सगे सम्बंधी मुँह फेरें।                          

कृपा करें ना देव देवियाँ, नौ ग्रह आँख दिखायेंगे।।

 

समय अशुभ तो श्वान गली का, घर में घुसकर काटेगा।                    

भाग्य प्रबल तो लल्लू भोंदू ,  ऊँची कुर्सी पायेंगे।।

 

अंत समय जब आयेगा सब, यहीं धरा रह जायेगा।                         

तोड़ सभी रिश्ते नातों को, इक दिन हम भी जायेंगे।।

 

जन्म मरण आना जाना हम, युगों युगों से घूम रहे।                               

जब तक भगवत् प्राप्ति न होगी, भगवन हमें घुमायेंगे।।

*संशोधित 

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13.आ० महर्षि त्रिपाठी जी

यह तीव्र वेग से चलता है 

न किसी के रोके रुकता है

गर साथ चले इसके हम तो 

ये मंजिल तक पहुचायेगा 

व्यर्थ गवायाँ इसको तो

पथ बार-बार भटकायेगा

जो करना है तत्काल करो

एक बार गया न आयेगा 

पाकर दौलत अभिमान न कर

सब यहीं धरा रह जायेगा 

जब लेगा यह करवट तो

राजा भी रंक हो जायेगा 

उठ जाग आलसी ! कुछ कर ले 

कर परोपकार खुद को तर ले

यूँ हो उदास क्यूँ बैठे हो ?

जो बीत गया वो बीत गया 

जिसने किया सदुपयोग समय का

हारी बाजी वो जीत गया

कर सदुपयोग समय का ये

हमको विजयगान सुनायेगा

रख धीरज आओ संग चलें

यह कोयले से हीरा बनायेगा 

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14.डॉ० प्राची सिंह

मनुज उठो अब... ( एक गीत)

मनुज उठो अब समय शिला पर इक स्वर्णिम युग अंकित कर दें

मानवता निष्प्राण अचेतन पड़ी उसे अनुप्राणित कर दें

 

मुस्कानों की ओढ़ दुशाला सिसकें कितनी करुण व्यथाएं

सुरमय सधती थीं पहले पर बेसुर चीखें आज प्रथाएं

बंद करें केवल शब्दों में कहना सुनना बातें मन की

लिये उजाले खुद हाथों में, चलो गढ़ें नव गर्व कथाएँ

 

नैतिकता की शंखनाद से अष्टदिशा अनुनादित कर दें

मनुज उठो अब......

 

तन्द्रा ने उत्थान-पतन की बिसरा दीं सब परिभाषाएं

डिजिटल सपनों नें पलड़ों पर, हाय! उतारीं मर्यादाएं

कण-कण बिंधा-बिंधा शंका से वक्त खड़ा है मौन अनावृत

अरुणिम आशाओं का ध्वज फिर भी प्रणवत ऊँचा फहराएं

 

मंद पड़ी लौ इन्कलाब की चलो पुनः चिर प्रज्ज्वलित कर दें

मनुज उठो अब......

 

"स्वार्थसिद्धि की बहती गंगा में झटपट हाथों को धो लें

चौराहों पर करें समीक्षा, चीख-चीख गुण-अवगुण बोलें

अनहोनी बीते साथी पर तो कर लें अतिशीघ्र किनारा"

समय हुआ, इस सोच-समझ-शैली को जाँचें-परखें-तोलें

 

मन के निश्छल निर्मल भावों का प्रवाह निर्बाधित कर दें

मनुज उठो अब........

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15.आ० नादिर खान जी

समय के साथ

 

न जाने कौन स जादू था

शहर की फिजाँ में

कि एक के बाद एक

खाली होते चले गए  

घर के सारे कमरे

और गाँव की बड़ी हवेली

देखते ही देखते

वीरान हो गई ।

 

बच्चों की किलकारियाँ

बैठक में आवाजाही

समय के साथ

सबकुछ ख़त्म हो गया ।

 

बूढ़ी माँ

ज़िंदा लाश बन गई

एक कमरे से दूसरे में घूमती है

सीलन लगी दीवारों पर

हर साल

नया कलेन्डर चढ़ाती है

दीमक लगे जर्जर दरवाज़े से  

बाहर ताकती है

 

ढेरों सपने बुनती है

जिन्हें बंद कर लेना चाहती है

मुट्ठी में

फिर खुद को बहलाती है

शहर में काम भी बहुत होते हैं

और ऊपर से ये मुआ फून (फ़ोन)

खराब ही बना रहता है |

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16.आ० डॉ० गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी

 

सोचता  तर्जनी  मैं  अधर  पर  धरूं

या समय से समय की शिकायत करूं

वह समय अब नहीं बस मधुर याद है

याद  भूले न वह  मैं  कभी जो मरूं

 

अब समय भी नहीं वह समय भी गया

इस समय को  कभी है न आती दया

हैं  हजारों  समय  के  ही  मारे हुये

वह समय है दफ़न यह समय है नया 

 

तुमने देखा  मुझे वह  समय भी रहा

तुमने चाहा मुझे  कान में कुछ कहा

हमने  सपने सजाये  विकल भी हुये

तुमने  छोड़ा मुझे  दर्द  भी वह सहा 

 

यह समय है  हमें जो  उठाता अभी

रूठता  है  अगर  तो  गिराता तभी

मौन रहता है लेकिन सजग जो हुआ

रंक  को राव  तत्क्षण  बनाता कभी  

 

सबको देता समय  एक अवसर यहाँ

पर समझता  उसे  मूढ़ मानव कहाँ

है भटकता  समय चूक  कर बावला

अपने हाथों  लुटाता है  अपना जहां

 

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17.आ० रमेश कुमार चौहान

दोहा-गीत

अविचल अविरल है समय, प्रतिपल शाश्वत सत्य ।
दृष्टा प्रहरी वह सजग, हर सुख-दुख में रत्य ।।

पराभाव जाने नही, रचे साक्ष्य इतिहास ।
जीत हार के द्वंद में, रहे निर्लिप्त खास ।।
जड़ चेतन हर जीव में, जिसका है वैतत्य ।। अविचल अविरल है समय...

(वैतत्य-विस्तार)

चाहे ठहरे सूर्य नभ, चाहे ठहरे श्वास ।
उथल-पुथल हो सृष्टि में, चाहे होय विनाश ।।
इनकी गति चलती सहज, होते जो अविवत्य । अविचल अविरल है समय...
(अविवत्य- अपरिवर्तनीय)

शक्तिवान तो एक है, बाकी इनके दास ।
होकर उनके साथ तुम, चलो छोड़ अकरास ।।
मान समय का जो करे, उनके हो औन्नत्य । अविचल अविरल है समय...
(अकरास-आलस्य, औन्नत्य-उत्थान)

कदम-कदम साझा किये, जो जन इनके साथ ।
रहे अमर इतिहास में, उनके सारे गाथ ।।
देख भाल कर आप भी, पायें वह दैवत्य । अविचल अविरल है समय...

*संशोधित 

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18.आ० मनन कुमार सिंह जी

जल चुका इतना शलभ अब भी समय है
गल चुका इतना शिखर अब भी समय है।
ढल चुका इतना गगन धरणी कहो घन
बल चुका इतना विहँस रवि भी समय है।
ढो रही धरणी कभी से है सभी कुछ
है थकी सरिता कभी अब भी समय है।
नेह भर आँखें रहीं उसकी नजर भर
कब थकीं हैं ताकतीं अब भी समय है।
कर न मन कुछ बेबसी की बात अब तो
हो रहा अब मनन मन का भी समय है।

 

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19. आ० लक्ष्मण धामी जी

ग़ज़ल

मत कर  बेहद रार समय से
किसने  पाया  पार समय से

पाना  है  जीवन में कुछ गर
हठकर बस इकबार समय से

ठानेगा  गर  जिद  तू जादा
पड़  जाएगी  मार  समय से

काट गया  हर पथ की बाधा
जिसने पायी  धार  समय से

उसको चिंता क्या छिनने की
पाए जो  अधिकार  समय से

जो दे जितना मान समय को
पाए  उतना  प्यार  समय से

जीवन उसका यार गजल सा
जो  पाए  आशआर समय से

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20. आ० रेनू भारती जी

कविता
समय की धारा है 
चलती ये जाये l
निरन्तर गति है 
ये रुकने न पाये l
आये हैं दुनिया में 
खुशियाँ लुटाएं l
चलो हम सब आज 
मिलकर के गाये l
गजल हो कोई गीत 
हम गुनगुनाये l
चलो हम मिलके 
सजीली कविता बनाये l

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21.आ० कान्ता रॉय जी

समय जरा रूक कर चलो

समय से सब हासिल है, समय से आगे कुछ नहीं
समय सम-कालीन करो ,समय जरा रूक कर चलो ।

क्षण -क्षण देखो लोग बदले ,जीवन का प्रलोभ बदले
नहीं कोई आशा चलो ,समय जरा रूक कर चलो ।

मन्त्रमुग्ध ये इंद्रधनुषी , सुख स्वप्न छोटी- छोटी
क्षण भंगुर प्रकाश चलो , समय जरा रूक कर चलो ।

ठिठकी उपवन की कलियाँ ,मधुवन की अब तंग गलियाँ
पतझड़ में तुम ना मिलो , समय जरा रूक कर चलो ।

कौंधें है प्रश्न कितना ,सवाल का सब जबाव देना
टाल टोल अब रहने दो,समय जरा रूक कर चलो ।

नीति अनीति लेना- देना,उम्मीदें बन चली खिलौना
करम वीर पथ पर बढो ,समय जरा रूक कर चलो ।

रसिया वो मन बसिया है ,प्रीतम डोरी रेशमिया है
प्राण प्रिय तुम गठ जोडों ,समय जरा रूक कर चलो ।

मोह ममता कौन राँधा ,शर्त- शर्त आँचल बाँधा
जोह -जतन सब रहने दो ,समय जरा रूक कर चलो ।


सुबह होते रात बीती,टिमटिमी जुगनू भी छूटी
पलछिन प्राण अविराम चलो,समय जरा रूक कर चलो ।

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22.आ० मनोज कुमार एहसास

ग़ज़ल

जो समय था चाहतों का कशमकश मे बह गया
बस सुलगने का तजुर्बा हाथ मेरे रह गया

झुर्रियों को उनके हाथों की ज़रा सा जब छुआ
वो समय सारी कहानी इस समय से कह गया

आओ उसकी ज़िन्दगी से जीत का सीखे हुनर
दौड़ मे फिर कोई मिल्खा कुछ समय से रह गया

मुफलिसी मे बुजदिली मे तेरी बातें तेरी धुन
दिल तेरी चाहत मे दिलबर हर समय को सह गया

लिख रहा हूँ चुपके चुपके मैं चमकता वो समय
जो तेरी दीवानगी मे बुझ गया या ढह गया

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23.आ० डॉ० नीरज शर्मा जी

वारि दुनिया को पिलाता है समय।

खुद मलंगी गीत गाता है समय॥१॥

चक्र इसका घूमता रहता सदा।

एक सी ही चाल चलता है समय॥२॥

ये नहीं रुकता किसी के वासते।

दमबदम गतिमान रहता है समय॥३॥

रेत की मानिंद कर से फिसलता।

ए! मनुज उठ जाग कहता है समय॥४॥

भूत को रख याद, जी, बस आज में।

गूढ़  ये  बातें  सिखाता  है  समय॥५॥

थाम कर मुठ्ठी में जिसने रख लिया।

मित्रता उससे निभाता है समय॥६॥

कद्र जो इसकी नहीं करते कभी।

सर्वदा उनको रुलाता है समय॥७॥

व्यक्ति जैसा आंक लेता है इसे।

या बुरा , अच्छा कहाता है समय॥८॥

सत युगी , त्रेता, कभी द्वापर यहां।

कलयुगी अब तो कहाता है समय॥९॥

चुक रहा पल पल खज़ाना जान लो।

आइना सबको दिखाता है समय॥१०॥

बीत जब जाता निकल कर हाथ से।

जा भविष्यत में समाता है समय॥११॥

व्यस्त जीवन से शिकायत कुछ करें।

पास में उनके नहीं बचता समय॥१२॥

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24. आ० रवि शुक्ला जी

वो सदा नूतन समय ही
सृष्टि का आधार था।

जब हुई जलमग्न धरती
इक नए अवतार को
देख पाये थे समय के
क्या कभी विस्तार को
वो समय की वेदना का
तीव्र पारावार था ।

युग्म में थे सब सुरक्षित
बीज में ही प्राण थे
चेतना अक्षुण्ण रख कर
कुछ नए निर्माण थे
निर्विकल्पित भाव में वो
समय का श्रृंगार था ।


काल कवलित सभ्यताओं
के बचे अवशेष में
मौन की ही बस ऋचाएं
गूंजती परिवेश में
किन्तु कालातीत अद्भुत
समय का संसार था ।

सब यहाँ परिवर्तनों के
पक्षधर है देखिये
किन्तु परिवर्तित समय ने
रूप नूतन ही लिए
शुद्ध सम्मोहक विलक्षण
सत्य एकाकार था।

******************************************* 

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ये सभी रचनाएँ पढ़कर बहुत खुशी हुई। सभी सम्मान्य प्रतिभागी रचनाकारों को व सम्मान्य डॉ.प्राची सिंह को तहे दिल बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। अगला आयोजन कब होगा तथा विषय क्या रहेगा, जानना चाहता हूँ ताकि हम नये रचनाकार भी अपना अभ्यास इस माध्यम से कर सकें।

नमस्कार आ० शेख उस्मानी जी 

संकलन के पन्नों का रसास्वादन करने पर बधाई.... सहर्ष स्वागत है आपका.

क्षमा कीजियेगा आपकी टिप्पणी आज ही देख पायी... अगला महोत्सव आयोजन आज रात्रि १२:०० बजे से आरम्भ होगा व आयोजन में रचनाओं के लिए इस बार का विषय 'आस/उम्मीद' रखा गया है. 

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