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आदरणीय साहित्य प्रेमियो,

जैसाकि आप सभी को ज्ञात ही है, महा-उत्सव आयोजन दरअसल रचनाकारों, विशेषकर नव-हस्ताक्षरों, के लिए अपनी कलम की धार को और भी तीक्ष्ण करने का अवसर प्रदान करता है. इसी क्रम में प्रस्तुत है :

"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-139

विषय - "धूप और छाँव"

आयोजन अवधि- 14 मई 2022, दिन शनिवार से 15 मई 2022, दिन रविवार की समाप्ति तक अर्थात कुल दो दिन.

ध्यान रहे : बात बेशक छोटी हो लेकिन ’घाव करे गंभीर’ करने वाली हो तो पद्य- समारोह का आनन्द बहुगुणा हो जाए. आयोजन के लिए दिये विषय को केन्द्रित करते हुए आप सभी अपनी मौलिक एवं अप्रकाशित रचना पद्य-साहित्य की किसी भी विधा में स्वयं द्वारा लाइव पोस्ट कर सकते हैं. साथ ही अन्य साथियों की रचना पर लाइव टिप्पणी भी कर सकते हैं.

उदाहरण स्वरुप पद्य-साहित्य की कुछ विधाओं का नाम सूचीबद्ध किये जा रहे हैं --

तुकांत कविता, अतुकांत आधुनिक कविता, हास्य कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, नज़्म, हाइकू, सॉनेट, व्यंग्य काव्य, मुक्तक, शास्त्रीय-छंद जैसे दोहा, चौपाई, कुंडलिया, कवित्त, सवैया, हरिगीतिका आदि.

अति आवश्यक सूचना :-

रचनाओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं है. किन्तु, एक से अधिक रचनाएँ प्रस्तुत करनी हों तो पद्य-साहित्य की अलग अलग विधाओं अथवा अलग अलग छंदों में रचनाएँ प्रस्तुत हों.
रचना केवल स्वयं के प्रोफाइल से ही पोस्ट करें, अन्य सदस्य की रचना किसी और सदस्य द्वारा पोस्ट नहीं की जाएगी.
रचनाकारों से निवेदन है कि अपनी रचना अच्छी तरह से देवनागरी के फॉण्ट में टाइप कर लेफ्ट एलाइन, काले रंग एवं नॉन बोल्ड टेक्स्ट में ही पोस्ट करें.
रचना पोस्ट करते समय कोई भूमिका न लिखें, सीधे अपनी रचना पोस्ट करें, अंत में अपना नाम, पता, फोन नंबर, दिनांक अथवा किसी भी प्रकार के सिम्बल आदि भी न लगाएं.
प्रविष्टि के अंत में मंच के नियमानुसार केवल "मौलिक व अप्रकाशित" लिखें.
नियमों के विरुद्ध, विषय से भटकी हुई तथा अस्तरीय प्रस्तुति को बिना कोई कारण बताये तथा बिना कोई पूर्व सूचना दिए हटाया जा सकता है. यह अधिकार प्रबंधन-समिति के सदस्यों के पास सुरक्षित रहेगा, जिस पर कोई बहस नहीं की जाएगी.
सदस्यगण बार-बार संशोधन हेतु अनुरोध न करें, बल्कि उनकी रचनाओं पर प्राप्त सुझावों को भली-भाँति अध्ययन कर संकलन आने के बाद संशोधन हेतु अनुरोध करें. सदस्यगण ध्यान रखें कि रचनाओं में किन्हीं दोषों या गलतियों पर सुझावों के अनुसार संशोधन कराने को किसी सुविधा की तरह लें, न कि किसी अधिकार की तरह.

आयोजनों के वातावरण को टिप्पणियों के माध्यम से समरस बनाये रखना उचित है. लेकिन बातचीत में असंयमित तथ्य न आ पायें इसके प्रति टिप्पणीकारों से सकारात्मकता तथा संवेदनशीलता अपेक्षित है.

इस तथ्य पर ध्यान रहे कि स्माइली आदि का असंयमित अथवा अव्यावहारिक प्रयोग तथा बिना अर्थ के पोस्ट आयोजन के स्तर को हल्का करते हैं.

रचनाओं पर टिप्पणियाँ यथासंभव देवनागरी फाण्ट में ही करें. अनावश्यक रूप से स्माइली अथवा रोमन फाण्ट का उपयोग न करें. रोमन फाण्ट में टिप्पणियाँ करना, एक ऐसा रास्ता है जो अन्य कोई उपाय न रहने पर ही अपनाया जाय.

फिलहाल Reply Box बंद रहेगा जो - 14 मई 2022, दिन शनिवार लगते ही खोल दिया जायेगा।

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ई. गणेश जी बाग़ी 
(संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक)
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सुस्वागतम

धूप और छाँव ( दोहे )
---------------------------

जीवन सब का ही रहा, धूप-छाँव का खेल।
रंग  हमेशा  ही  भरे, इन  दोनों  का  मेल।।
*
विचलित हो मत धूप से, भले झुलसते पाँव।
वह जीवन अच्छा  नहीं, जहाँ रहे नित छाँव।।
*
कभी सुहाती  छाँव  है, कभी सुहाती धूप।
दोनों के अनुराग से, खिलता जीवन रूप।।
*
धूप किसी को सुख लगे, और किसी को पीर।
ऐसी ही  कुछ  छाँव  की, लगती  हर  तस्वीर।।
*
सब माँगें दिन छाँव के, कड़क लगे जब धूप।
किन्तु निरन्तर जब  रहे, खले छाँव का रूप।।
*
सुख दुःख जीवन गाँव में, धूप छाँव से नित्य।
इन  दोनों  के  रूप  हैं, भले  बुरे  सब  कृत्य।।
*
हद से बढ़कर छाँव  भी, है  जीवन का अन्त।
धूप बिखरती जो अधिक, सूखे रस भी कन्त।।
*
मौलिक/अप्रकाशित

नमस्कार,बहुत सुंदर दोहे धूप - छाँव पर बधाई स्वीकारे लक्ष्मण धामी जी।

आ. दीपाली जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। 

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, धूप और छाँव पर अति सुंदर दोहों के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

आ. भाई दयाराम जी , सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

आदरणीय लक्ष्मण भाई

सुन्दर दोहावली की बधाई

धूप बिखरती जो अधिक, ....... जब अधिक 

सूखे रस भी कन्त।। .......... किस रस की बात हो रही है ?  कहीं अमरस [  आमरस ]  तो नहीं 

आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति, प्रशंसा व सुझाव के लिए हार्दिक आभार।

आदरणीय धामी जी बहुत सुन्दर दोहे हैं बधाई |

आ. भाई चौथमल जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

धन्यवाद

धूप छाँव पर तीन मुक्तक
(1)
कभी धूप अच्छी लगती है, कभी छाँव लगती प्यारी है,
मौसम सा बदले मानव मन, मतलब की दुनिया सारी है,
कर्म किया जैसा फल मिलता, वैसा है कुदरती कानून,
हमने है छेड़ा कुदरत को, अब आई उसकी बारी है।

(2)

मानव जीवन ऐसा जैसे, धूप छांव का खेल है,
खुशी और गम का भी जग में, बेसुरा तालमेल है,
कभी किसी को बिन माँगे ही मिलती धूप खुशियों की,
कोई पेट के खातिर झेले जग की धकम पेल है।

(3)

आजकल धूप का सितम हर जगह बहुत भारी है,
हर मानव को ये सितम सहने की लाचारी है,
कड़क धूप के आगे छाँव हुई है बहुत बेबस,
मौसम की मनमानी आगे धरा बेचारी है।
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
- दयाराम मेठानी

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